देवताके नाम और उनके स्वरूपमें अद्वैत होता है । नामके द्वारा रूपके साथ प्रीति हो जाती है और स्वरूपसे प्रीति होनेपर नाम सहज ही स्मरण हो जाता है। स्वरूपसे प्रेम हमें नाम सुमिरनकी ओर ले जाता है और यही नामका अखंड सुमिरन हमें सगुणसे निर्गुणकी ओर ले जाता है ! इस सम्बन्धमें सन्त तुलसीदास कहते हैं –
* को बड छोट कहत अपराधू । सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू ॥
देखि अहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना ॥2॥ – बाल कांड , रामचरितमानस
अर्थ : इन (नाम और रूप) में कौन बडा है, कौन छोटा, यह कहना तो अपराध है। इनके गुणोंके गूढ रहस्य सुनकर साधु पुरुष स्वयं ही समझ लेंगे। रूप नामके अधीन देखे जाते हैं, नामके बिना रूपका ज्ञान नहीं हो सकता ।
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