आयुर्वृद्धसे भी श्रेष्ठ ज्ञानवृद्ध और तपोवृद्धको माना गया है


न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः ।
यो वैयुवाsप्यधीयानस्तं देवा: स्थविरम् विदुः।। – मनुमृति (२:१५९)                                                                                           
अर्थ : व्यक्तिके केश श्वेत हो जानेसे वह बडा या श्रेष्ठ नहीं होता अर्थात् आदरणीय नहीं हो जाता । युवा व्यक्ति भी ज्ञान प्राप्त कर लेनेके पश्चात, बुद्धिमानोंकी दृष्टिमें वंदनीय हो जाता है।
भावार्थ : हमारी संस्कृतिमें मात्र आयुर्वृद्धको ही सम्मान नहीं दिया जाता है अपितु आयुर्वृद्धसे भी श्रेष्ठ ज्ञानवृद्ध और तपोवृद्धको माना गया है। अतः अल्प आयुवाले ज्ञानी एवं तपस्वी गुरुको अधिक आयुवाले वाले शिष्य नमन करते हैं, अल्पायु अष्टावक्रने राजा जनकको आत्मज्ञानकी कुंजी दी और राजाने उन्हें गुरु मान उनके चरणोदक ग्रहण किए यही हमारी संस्कृति है। – तनुजा ठाकुर



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