धर्मशिक्षणके अभावमें आज हिन्दुओंके सार्वजानिक धार्मिक उत्सवोंमें भी अनेक विकृतीकरण आ चुके हैं । जैसे अनेक बार गणेशोत्सव, दुर्गापूजा उत्सव इत्यादिमें जो मूर्तियां स्थापित की जाती हैं,वे शास्त्रोक्त नहीं होतीं हैं । मिट्टीकी मूर्तिके स्थानपर माचिसकी तीली, दालके दाने, रुई, सीप और न जाने कौन-कौनसे पदार्थसे मूर्तियां बनाई जाने लगी हैं । अनेक बार मूर्तिका स्वरुप भी मूर्तिविज्ञान अनुसार नहीं होता है एवं सबसे दुःखकी बात यह है कि यह सब अधर्म हम हिन्दू ही करते हैं और आज सामान्य हिन्दू सार्वजानिक उत्सवमें देवताकी कृपा पाने हेतु अपनी वृत्तिको अन्तर्मुख कर, उनके स्वरुपके दर्शन कर उनकी आराधना करनेके स्थानपर अपनी वृत्तिको बहिर्मुख कर मण्डपोंके आकार, उसके स्वरुप, बाह्य सजावट एवं शास्त्र विरुद्ध मूर्तियोंको देखनेमें अधिक रुचि रखते हैं, इससे ही हिन्दुओंको धर्मशिक्षण देना कितना आवश्यक है, यह ज्ञात होता है ! किंचित सोचें, सब कुछ शास्त्र विरुद्ध कर, आप अपने आराध्यकी कृपा कैसे प्राप्त कर सकते हैं ?
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