श्रीगुरु उवाच


त्यागका अर्थ वस्तुओंके त्यागसे नहीं अपितु उनके प्रति आसक्तियोंसे है । आरम्भमें शिष्यके पास जो भी वस्तु होता है, गुरु उसका त्याग करवाते हैं और जब आसक्ति नष्ट हो जाती है, तब उन्हें भरपूर देते हैं । चूंकि छत्रपति शिवाजी महाराजको राज्यके प्रति आसक्ति नहीं थी; अतः श्रीगुरुके चरणोंमें अर्पित किया हुआ राज्य, उनके श्रीगुरुने उन्हें पुनः दे दिया । – परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था  
साभार : मराठी दैनिक सनातन प्रभात (https://sanatanprabhat.org)



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