श्रीगुरु उवाच


भूखेको अन्न दें, निर्धनको धन दें, ऐसा भावनाके स्तरपर करना, यह दुःखी मानवकी वास्तविक सेवा नहीं; क्योंकि इससे उनकी समस्याओंका कारण दूर नहीं होता । उनकी दु:खोंका मुख्य कारण है, प्रारब्ध ! वह मात्र साधनासे ही दूर किया जा सकता है ।



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