साधना कर, सूक्ष्मातिसूक्ष्म होकर या सर्वव्यापी होकर, ईश्वर समान उनके सूक्ष्मातिसूक्ष्म या सर्वव्यापी रूपसे एकरूप होते हैं । ध्यानयोगसे सूक्ष्मातिसूक्ष्म होकर ईश्वरसे एकरूप होते हैं, जबकि समष्टि साधनासे ईश्वरके सर्वव्यापी रूपसे एकरूप होते हैं । ध्यानयोगकी अपेक्षा, गुरुकृपायोग अनुसार समष्टि साधना अधिक सहज और सुलभ है; अतः इसकेद्वारा आध्यात्मिक उन्नति शीघ्र होती है । – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
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