श्रीगुरु उवाच


निरक्षर यदि कहे कि ‘सभी भाषाओंके अक्षर समान ही होते हैं’, तो जिस प्रकार यह उसका अज्ञान दर्शाता है, उसी प्रकार ‘सर्वधर्मसमभाव’ कहनेवाले भी अपना अज्ञान दर्शाते हैं । ‘सर्वधर्मसमभाव’ कहना ‘सभी औषधियां, सभी कानून समान ही हैं’, ऐसा कहनेके बराबर है ।



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