श्रीगुरु उवाच


wedding_handsसाधकका एवं सर्वसाधारण व्यक्तिके विवाहका उससे संबंध
साधकका विवाह संसारमें कमसे कम ३० प्रतिशत और साधनामें कमसे कम ३० प्रतिशत पूरक होनेसे सांसारिक जीवन सुखमय हो, साधनामें प्रगति होती है । सर्वसाधारण व्यक्तिमें यह प्रमाण अनुक्रममें १० प्रतिशत और २ प्रतिशत होत है । -परात्पर गुरु डॉ  जयंत आठवले (११.११.२०११)
भावार्थ : विवाह प्रारब्ध अनुसार घटित होता है; परंतु साधना करनेसे विवाह, ईश्वरप्राप्ति हेतु किस प्रकार अधिक प्रमाणमें पूरक हो जाता है, यह श्रीगुरुके उपर्युक्त सुवचनसे स्पष्ट रूपसे समझमें आता है | साधना न करनेके कारण वैवाहिक जीवनमें दाम्पत्य सुखका प्रमाण भी अल्प रहता है और साधना हेतु भी वह संबंध पूरक भी नहीं होता है ; अतः यदि ब्रह्मचर्य कालसे ही साधनाके संस्कारका बीजारोपण किया जाए और जब वह स्त्री या पुरुष गृहस्थ जीवनमें प्रवेश करेगा तो विवाह रूपी संस्था उसके लिए सुखदायी होगी, साथ ही विवाह उसके जीवनमें धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षकी प्राप्ति हेतु भी पूरक होगा | आज साधनाके अभावमें अनेक गृहस्थ-आश्रमी दु;खी हैं और प्रारब्धकी तीव्रताके बोझ तले झुके हुए हैं | घरेलू हिंसा, कलह-क्लेश, संबंध-विच्छेद जैसी घटनाओंमें वृद्धिके भी मुख्य कारण साधकत्त्व एवं साधनाका अभाव ही है; अतः हिंदुओंको धर्म शिक्षण देकर साधनाकी ओर प्रवृत्त करना परम आवश्यक है | जिस घरमें कुलदेवता एवं पितर प्रसन्न रहते हैं, उस घरमें श्रेष्ठ कुलकी संस्कारी कन्या बहू रूपमें आती हैं एवं ऐसे कुलकी पुत्रियां भी श्रेष्ठ कुलमें ब्याही जाती हैं | – तनुजा ठाकुर


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