ख्रिस्ताब्द २००७ से मेरा स्वास्थ ठीक न होनेके कारण मैं कहीं बाहर नहीं जा सकता। तथापि गुरूकृपायोगानुसार साधना कर साधक प्रगति कर रहे हें। इससे यह ज्ञात होता है कि व्यक्तिसे (मुझसे ) तत्व (गुरुकृपायोग )अधिक प्रभावशाली है । – परात्पर गुरु परम पूज्य डॉ. जयंत आठवले (१७.१०.२०१३ )
संदर्भ : दैनिक सनातन प्रभात
भावार्थ : परम पूज्य गुरुदेवकी प्राणशक्ति सूक्ष्म अनिष्ट शक्तियोंसे अनेक वर्ष युद्ध करते-करते अब न्यूनतम स्तरको (२९ -३२ प्रतिशत) तक पहुंच चुकी है और इस कारण वे वर्ष २००७ से गोवामें ही स्थायी रूपसे रहने लगे हैं, इससे पूर्व वे भिन्न स्थानपर जाकर प्रवचन, सत्संग, आध्यात्मिक अभ्यासवर्ग, इत्यादिके माध्यमसे धर्मप्रसार करते थे |
संतोंके लेखनमें इतना चैतन्य होता है कि उनके लेखनको पढकर अनेक जिज्ञासु एवं साधक साधना पथपर अग्रसर होते हैं, इसलिए आज भी अनेक सहश्रों वर्ष पूर्व संतों और ऋषियोंद्वारा निर्मित ग्रंथ, मानव जातिका मार्गदर्शन करते हैं |
हमारे श्रीगुरुद्वारा प्रतिपादित गुरुकृपायोगानुसार साधनाके सिद्धान्तको आत्मसात कर विश्वके अनेक धर्मों एवं भिन्न पंथोंके साधक आध्यात्मिक प्रगति भी करने लगे हैं |
यथार्थमें परम पूज्य गुरुदेव जैसे परात्पर पदपर आसीन संतोंके अस्तित्त्व मात्रसे ही साधक जीव, जिसमें ईश्वर और गुरुके प्रति भाव हो उनका उद्धार होने लगता है | यह उनकी विशेषता और विनम्रता है कि वे किसीको व्यक्तिनिष्ठ न बनाकर तत्त्वनिष्ट कर आनेवाले कलिकालकी लिए सर्व मानव जाति हेतु एक आदर्श एवं सरल आध्यात्मिक मार्गका प्रतिपादन कर अपने जीवनकालमें ही अनेक साधकको इसकी प्रचीति दे रहे हैं ! – तनुजा ठाकुर
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