विवाहके सन्दर्भमें योग्य दृष्टिकोण रखना आवश्यक !


‘पुत्री संसारमें रहकर साधना करे’, ऐसी स्वेच्छाके होते पुत्रीको ‘विवाह ही ईश्वरेच्छा हो सकती है’, ऐसा दृष्टिकोण देनेवाले एक साधक कुटुम्बीय ।
एक पूर्णकालीन सेवा करनेवाली साधिकाको विवाह कर मायाके बन्धनमें बन्धनेकी इच्छा नहीं थी, तब उसके साधक माता-पिताने उसे निम्न दृष्टिकोण दिया –
पूर्ण समय साधना करना, यह तुम्हारी स्वेच्छा हुई । तुम्हारे प्रारब्धमें यदि संसारमें (विवाहित) रहकर साधना करना होगा तो तुम्हें ईश्वरेच्छा स्वीकारना होगी ! इसमें ध्यान देनेवाली बात यह है कि १. साधिकाके प्रारब्धमें क्या है ? यह जिस प्रकार साधिकाको पता नहीं है, वह उसके कुटुम्बके सदस्योंको पता है क्या ? २. पुत्रीने संसारमें रहकर साधना करनी चाहिए । यह कुटुम्बियोंकी स्वेच्छा होनेसे वे उसका विवाह करना ही ईश्वरेच्छा है, ऐसा दृष्टिकोण दे रहे हैं । प्रत्यक्षमें ईश्वरेच्छा क्या है ? यह माता-पिताको कैसे पता ? प्रत्यक्षमें साधकोंने अविरत साधनाकर इसी जन्ममें शीघ्रातीशीघ्र ईश्वरप्राप्ति कर ईश्वरीय कार्य हेतु स्वयंको समर्पित करना चाहिए, इससे भिन्न ईश्वरेच्छा क्या होगी ? साधक होते हुए भी कुटुम्बियोंका मायाके प्रति लगाव होनेके कारण, वे साधनाका सन्दर्भ देते हुए इन शब्दोंद्वारा साधिकाको ही दिशाभ्रमित करनेका प्रयत्न कर रहे थे । साधक कुटुम्बियोंने मायाकी निरर्थकता तथा साधनासे ही जीवन यथार्थ रूपसे सार्थक होता है, यह ज्ञान होनेपर, वे अपने पुत्र-पुत्रियोंको साधनाके लिए प्रोत्साहित करें, यह अपेक्षित है ! – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले  (८.१.२०१५)



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