श्रीगुरू उवाच


लिपिक निर्माण करनेवाली शिक्षणपद्धति परिवर्तित कर धर्माधिष्ठित शिक्षणपद्धतिका अवलम्बन करना आवश्यक !
 वर्तमान कालकी रसातलमें ले जानेवाली शिक्षणव्यवस्था, एक चिन्ताका विषय बन चुकी है । अंग्रेजोंने हिन्दुओंका तेजोभंग करनेके लिए प्रभावी गुरुकुल शिक्षणपद्धति बन्दकर, मैकाले प्रणित शिक्षणपद्धति आरम्भ की । दुर्भाग्यसे स्वतन्त्रतोपरान्त कालमें राज्यकर्ताओंने इसी शिक्षणपद्धतिको आगे भी यथावत बनाए रखा । आजकल बालकोंको सिखाए जानेवाले रेखागणित, बीजगणित, भूगोल जैसे विषयोंका उनकी उत्तरोत्तर आयुमें कोई लाभ नहीं होता । इसके परिणामस्वरूप आजकी शिक्षणपद्धति ‘लिपिक’ निर्माण करती है । दूसरी बात यह कि आजकल बालकोंको विद्यालयमें साधना नहीं सिखाई जाती है, इससे विद्यार्थियोंमें नीतिहीनता, व्यसनाधीनता एवं हिंसकप्रवृत्तिमें वृद्धि हो रही है । अर्थात सुशिक्षित या पदव्युत्तर शिक्षणप्राप्त व्यक्ति सुसंस्कारित अथवा नीतिमान हो, यह आवश्यक नहीं है ।
    पूर्वकालमें बालक १२ वर्ष गुरुकुलमें रहकर शिक्षण प्राप्त करते थे । उस समय उन्हें भविष्यमें उदरनिर्वाह हेतु आवश्यक शिक्षण दिया जाता था । इसके साथ ही उन्हें साधना भी सिखाई जाती थी; अतः वे नीतिमान एवं धर्मशील होते थे । ऐसी शिक्षणपद्धतिसे राष्ट्र केवल सम्पन्न ही नहीं होता; अपितु सदाचारके कारण आनन्दयुक्त भी होता है । ऐसे विचारोंसे युक्त आचरणके कारण आध्यात्मिक समाधान एवं आनन्दयुक्त राष्ट्रोंकी सूचीमें भूटान प्रथम क्रमांकपर है तो किसी कालमें विश्वगुरुके नामसे प्रसिद्ध भारत इस सूचीमें रसातलको गया है । हिन्दू राष्ट्रमें धर्माधिष्ठित शिक्षणपद्धतिके कारण भारत जगमें सर्वाधिक आनन्दयुक्त देश होगा ।



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