स्त्रियोंने अपने ससुराल पक्षको मनसे अपनानेका महत्व !


एक बात जो मैंने अपने धर्मप्रसारके मध्य पाया है कि जो स्त्रियां अपने पति या ससुरालसे या अपने ससुराल पक्षसे मानसिक दूरी रखती हैं अर्थात पतिको तो अपना लेती हैं किन्तु उनके कुलके लोगोंको, संस्कारको या अपने पतिका उपनाम नहीं लगाती हैं या अपने सास-ससुरकी अपेक्षा अपने माता-पिताको अधिक महत्त्व देती हैं, उनके घर रहती हैं या उन्हें अपने घर रखती हैं, उनके बच्चोंको तीव्र पितृ श्राप भोगना पडता है; क्योंकि ऐसा करनेसे उनके पितर, स्त्रियोंके इसप्रकारके अहंकारी वर्तनसे क्षुब्ध होकर, उन्हें कष्ट देने हेतु उनके मर्मस्थान अर्थात उनके बच्चोंको कष्ट देते हैं, इसके मेरे पास बहुतसे उदाहरण हैं इसलिए विवाह होनेके पश्चात स्त्रियोंने अपने ससुराल पक्षको मनसे अपनाना चाहिए । उनके उपनाम, कुलाचार एवं कुलदेवता और संस्करोंको अपनाना चाहिए, यहां तक कि यदि किसी स्त्रीका सम्बन्ध विच्छेद हो गया हो और उसकी सन्तानें हो तो भी उसने ऐसा ही करना चाहिए अन्यथा सन्तानोंको अत्यधिक पितृदोष लगता है !   वैसे ही आजकल अनेक पुत्रियां अपने सास-ससुरका ध्यान नहीं रखती हैं; किन्तु वहीं अपने घरमें अपने माता-पिताको बडे प्रेमसे रखती हैं । ऐसे स्त्रियोंने यह ध्यान रखना चाहिए कि एक तो ऐसा करनेसे वे अपने माता-पिताके साथ जो लेन-देन लगभग समाप्त हो चुका था, उस खातेको वे अपने क्रियमाणसे पुनः आरम्भ कर रही हैं ।    एक महत्त्वपूर्ण तथ्यका ध्यान रखें कि हमारे सम्बन्ध हमारे पूर्व जन्मोंके कर्मफलके अनुसार बनता है, पुत्रीके साथ माता-पिताका लेन-देन उसके विवाहके पश्चात अल्पसा ही बच जाता है; इसलिए हमारे हिन्दू धर्ममें कहा जाता था कि ब्याहता पुत्रीके घरका अन्न या जल नहीं ग्रहण करना चाहिए । वस्तुत:इसके पीछे गूढ आध्यात्मिक कारण निहित था । वैसे ही हमारे यहां घर-जामाताको (घर-दामादको) भी सम्मानकी दृष्टिसे नहीं देखा जाता है । वस्तुत: इसके पीछे भी यही आध्यात्मिक सिद्धान्त निहित है । जामाताका अपने ससुरालसे जो तीव्र लेन-देन होता है; उसीके परिणाम वह उस घरकी पुत्रीका जीवन पर्यंत देखभाल करते हैं, उन्हें और लेन-देन नहीं चाहिए होता है; इसलिए जामाताका अधिक दिन ससुरालमें रहना अच्छा नहीं माना जाता है ।    इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि यदि किसी स्त्रीका भाई न हो तो वह अपने माता-पिताका ध्यान न रखें या पुत्रद्वारा उपेक्षित अपने माता-पिताका ध्यान न रखें, मात्र शास्त्र समझ कर लें और अपनी पुत्रियोंको योग्य शिक्षा दें ! आजकी स्त्रियोंमें यह अनुचित भावको प्रबल होते पाया है; इसलिए इसे लिख रही हूं और ऐसे स्त्रियोंके पुरुषोंमें जैसे विवेक होता ही नहीं है ऐसा मुझे लगता है, वे अपनी पत्नीकी हर अनुचित मांग या सुझावको मान लेते हैं, ऐसा कर, वे अपना, अपनी पत्नीका और अपने बच्चोंका सबका अध्यात्मिक अहित करते हैं ! इसलिए सभीको धर्म और साधना सिखानेकी अत्यन्त आवश्यकता है जिससे उनसे ऐसा अयोग्य वर्तन न हो ।



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