आज अधिकांश पुत्रियोंको धर्म एवं साधनाका संस्कार घरमें नहीं दिया जाता है । इसके परिणामस्वरूप उनमें जो विनम्रता धर्म और साधनासे आती है, वह रहती नहीं है; इसलिए वे जब विवाहके पश्चात अपने ससुराल जाती हैं तो अहंकारके कारण उनके कुलाचार और संस्कारोंको आत्मसात नहीं करती हैं वरन अपने अस्तित्व एवं मायके पक्षके कुलाचारका ही पालन करती हैं, समाजमें बडे स्तरपर प्रेम विवाह होनेके कारण एवं पुरुषोंमें धर्म और साधनाका तेज न होनेके कारण, आज यह विसंगति बढ गई है, यह कहना अनुचित नहीं होगा । कुछ तो अपनी मायके पक्षके ही सर्व नियम या कुलाचारका पालन ससुरालमें भी करती हैं और कुछ तो पूर्ण रूपसे आधुनिक हो जाती हैं अर्थात उन्हें कुलाचार इत्यादिसे कोई मतलब नहीं होता । अपने ससुरालके कुलाचारका न पालन करनेसे क्या होता है यह मैं एक अपने जीवनमें अनुभूत किए हुए एक प्रसंगसे बताती हूं । एक दिवस मैं एक साधकके घर गई थी । उनकी माताजीने हमारे लिए बडे प्रेमसे भोजन बनाया था, भोजन ग्रहण करनेपर जब मेरा ध्यान उनके पांवकी ओर गया तो मेरा पूर्ण शरीर सिहर उठा ! उनका पांव किसी चर्म रोगके कारण सडा हुआ प्रतीत हो रहा था, उसे खून-पीब इत्यादि निकल रहा था ! मैंने उस साधक भाईसे उनकी माताजीके पांवके विषयमें पूछा तो उन्होंने जो बताया, वह सभी अहंकारी स्त्रियोंके लिए एक सीख है ! उन्होंने कहा, “हम जन्मसे ही मांके पांवको ऐसे ही देख रहे हैं, अनेक चिकित्सकोंको दिखानेपर भी आज तक कोई लाभ नहीं हुआ है ! यह आध्यात्मिक कष्ट है, एक सन्तने बताया कि मेरी माताजीसे हमारी कुलदेवी रुष्ट हैं । वे जब भी उनके लिए कुछ करती है तो यह घाव सूख जाता है; किन्तु उनका विवाह इस कुलमें उनके पिताजीसे बलात(जबरदस्ती) थोप दिया था; इसलिए वे उनकी कुलदेवीको भी सहर्ष स्वीकार नहीं कर पाती हैं । वे एक बंगाली हैं और मेरे पिताजी उत्तर प्रदेशके हैं । उन्हें यह विवाह स्वीकार्य नहीं था किन्तु उनके पिताजीने अपने अभिन्न मित्रके पुत्रसे उनका विवाह मित्रता बनाए रखने हेतु करवा दिया था । वे यहां सब कुछ बंगाली परम्परा अनुसार ही करती हैं । मेरे पिताजी बहुत सरल है (ऐसे पुरुषको सरल नहीं, विवेकशून्य कहना अधिक उचित होगा), वे माताजीसे बहुत प्रेम करते हैं; इसलिए उनकी सभी योग्य-योग्य बातें मान लेते हैं !” मैंने सोचा मैं उन्हें समझाकर देखती हूं, जब मैंने उनसे कहा कि पतिके कुलाचारका पालन करना विवाहित स्त्रीका धर्म है तो मुझपर भडक गईं और कहने लगी कि वे उत्तर प्रदेशके लोगोंसे (‘भैया लोगोंसे’) ही घृणा करती हैं, वे अपने पिताजीको भी बुरा-भला कहने लगीं तो मैं समझ गई कि इन्हें समझाना सरल नहीं है ! वे इस रोगके साथ ही मृत्युको कुछ वर्ष पूर्व प्राप्त हुईं; किन्तु उन्होंने अन्ततक अपने ससुराल पक्षके किसी भी बातको स्वीकार नहीं किया ! यह सत्य है कि उनके साथ अन्याय हुआ था किन्तु विवाह उपरान्त स्त्रीका नूतन जन्म होता है ऐसा हमारा शास्त्र कहता है; अतः ऐसे स्थितिमें विवेकसे सर्व निर्णय लेना चाहिए; किन्तु अहंकारी व्यक्तिका विवेक शून्य हो जाता है ! यहां एक विशेष तथ्य बता दें कि यदि कोई स्त्री आध्यत्मिक रूपसे प्रगत अवस्थामें हो तो वह अपने ससुरालके कुलदेवताका नामजप न करे तो भी चलता है और अपने पिताके घरके कुलदेवताका अवश्य ही नामजप कर सकती हैं; किन्तु सभी स्त्रियोंने यह बात ध्यान रखना चाहिए कि उनकी सन्तानोंमें पतिके कुलदेवता, कुलाचार एवं उनकी परम्पराओंके प्रति सम्मान निर्माण हो, ऐसे उनके प्रेस होने चाहिए और यह माताका मूल धर्म है ! यहां मैं रूढि या अनुचित परम्पराओंकी बात नहीं कर रही हूं; किन्तु उनके ससुराल पक्षमें जिसप्रकारके धार्मिक एवं आध्यात्मिक अनुष्ठान होता है उसका पालन करना एवं करवाना उसका धर्म है ! जैसे एक बार किसीने मुझसे कहा, आपका सबकुछ आपके गुरुसे मिलता-जुलता है ! स्त्रीके परम कल्याणका दो ही मार्ग है या तो वह या तो अपने पतिसे एकरूप हो जाए या जो संन्यासी है या पूर्णकालिक साधक है वे अपने गुरुसे ! मैं अपने गुरुके ज्ञानसे अभिभूत होकर अपन सर्वस्व त्यागकर, उनके प्रप्ति शरणागत हुई थी और मेरा मूल उद्धेश्य मोक्षको पाना है ! ऐसेमें यदि मेरे सीख, मेरे श्रीगुरुके विपरीत हो तो मैं अपने धर्मसे विमुख हो रही हूं, ऐसेमें मेरा कल्याण कभी नहीं हो सकता है ! उस बुद्धि, शिक्षा और ज्ञानका क्या औचित्य जो आपको परम कल्याणकी ओर प्रवृत्त न करें ! मैंने सदैव ही भगवानसे प्रार्थना करती हूं कि जिस दिवस मैं अपने श्रीगुरुके सीखसे दूर हो जाऊं उसकी क्षण मेरी सारी साधनाका फल वे नष्ट कर दें; क्योंकि ऐसा साधनाका क्या औचित्य जो मुझे मेरे श्रीगुरुके चरणोंमें अनुराग निर्माण कर, शरणागति और लीनता निर्माण न कर सके !
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