अगस्त २००५ में मैं भुवनेश्वरके पुस्तक मेलेमें सनातन संस्थाके ग्रन्थ प्रदर्शनी कक्षमें(स्टालपर) सेवा दे रही थी | एक सात्त्विक वृत्तिके बुद्धिजीवी हमारे प्रदर्शनी स्थलपर आये | मैं उन्हें सभी ग्रंथोंका परिचय देकर, उन्हें सबकी विशेषताएं बता रही थी | ग्रंथोंके आद्वितीय ज्ञानसे वे अति प्रसन्न हुए | उन्होंने साधना सम्बन्धित कुछ ग्रन्थ चुने और जैसे ही उनका मूल्य देनेवाले थे, उनकी पत्नी आ गईं | उन्होंने एक विचित्र सी भाव भंगिमा बनाकर ग्रंथोंकी ओर देखते हुए बोलीं, “ये सब क्या उल्टी-सीधी पुस्तकें लेकर पैसे व्यर्थ कर रहे हो ?, कितनेका है ये सब ?” पतिने बडी ही विनम्रता एवं प्रसन्नतासे कहा, “बहुत विलक्षण ज्ञान है इनमें, इसे ले जाकर पढूंगा और साधना करूंगा | कुल १५०० रुपए का है ! पत्नीने क्रोधित होकर कहा, “१५०० का, सारा पैसा यही व्यय कर दोगे क्या ? हमें कोई संन्यासी थोडे ही बनना है ! रखो इन्हें, इसकी हमें कोई आवश्यकता नहीं है !” पत्नीके इस प्रतिक्रयापर उन्होंने गिडगिडाते हुए कहा, “लेने दो, ये लोग वाराणसीसे आये हैं, यहां नहीं मिलेगा ऐसे ग्रन्थ !” पत्नीके अपने स्वर कठोर कर बोलीं, “नहींका, अर्थ नहीं होता है, समझ गए चलो अब |” और पतिका हाथ पकडकर उसे ले जाने लगीं ! पतिने पुनः कहा, “अच्छा चलता हूं, एक ग्रन्थ तो ले लेने दो, मात्र एक ग्रन्थ !” मैं सब मात्र देख रही थी ! जैसे ही उसकी विनतीपर दयाकर पत्नीने हामी भरते हुए आदेश देते हुए कहा, “एक ही लेना !” तो पतिने मुझसे कहा, “आपको मेरे लिए जो सबसे योग्य ग्रन्थ हो वह दे दें |” मैंने उन्हें ‘अध्यात्मका प्रस्तावनात्मक विवेचन’ यह ग्रन्थ उनके हाथमें दिया |” पत्नीने उनके हाथसे लपक कर अपने हाथमें ले लिया | मुझसे पूछीं, “ कितनेका है ?” मैंने कहा “४५ रूपयेका !” वह उस ग्रन्थको पटककर बोलीं, “इतना पतला पुस्तक और इतना अधिक मूल्य | नहीं चाहिए हमें ! चलोजी !” वे महोदय मेरी ओर बडी ही असहायसी दृष्टिसे देखते हुए चले गए ! मुझे उस स्त्रीने बोलनेका अवसर ही नहीं दिया ! यह तो मैंने एक प्रसंग बताया है, ऐसे अनेक प्रसंग मैंने धर्मप्रसारके मध्य अनुभव किए हैं ! इस लेख शृंखलामें ऐसे कुछ प्रसंग लेनेवाली हूं जिससे ऐसी वृत्तिके स्त्रियोंको कुछ दृष्टिकोण दे सकूं जिससे उन्हें भान हो कि उनसे अज्ञानतावश या अहंकारवश कितनी बडी चूक हो रही है ! एक बातका ध्यान रखें जैसे किसीको स्वार्थवश मृत्युके घाट उतारना एक अक्षम्य अपराध होता है वैसे ही साधना करना प्रत्येक जीवका मौलिक एवं जन्मसिद्ध अधिकार है और यदि कोई उसे करना चाहता हो तो उसके मार्गमें स्वार्थवश, मोहवश या अहंकारवश, भूलसे भी अडचनें निर्माण नहीं करना चाहिए | यह सिद्धांत सभीपर लागू होता है जैसे पुत्र यदि साधना करना चाहता तो माता-पिताने उसमें अडचनें नहीं डालनी चाहिए, पतिने पत्नीकी साधनामें और पत्नीने पतिकी साधनामें व्यवधान नहीं डालना चाहिए, यह एक अक्षम्य अपराध होता है ! यदि आपने इस जन्ममें अपने किसी सम्बन्धीके मार्गमें अडचनें निर्माण की तो अगले किसी भी जन्ममें जब आपकी साधनाकी इच्छा होगी तो या तो वही जीव जिसके मार्गमें आपने अडचनें निर्माण की थी वह आपको मार्गमें विघ्न डालेगा या यदि वह मुक्त हो गया हो तो किसी और जीवके माध्यमसे आपको अडचनें आएंगी ही | यह सृष्टिके कर्मफल सिद्धांत अनुसार घटित होगा ही; अतः कभी भी किसीकी साधनाको भावनात्मक या भयात्मक वृत्ति अपनाकर उसे उस मार्गसे न हटाएं | जैसे समष्टि साधना करनेवाले जीव ईश्वरके सबसे अधिक प्रिय होते हैं वैसे ही भक्तके मार्गमें अडचनें निर्माण करनेवाले सबसे अप्रिय होते हैं ! अतः ऐसे पापकर्म करना टालें, आपसे साधना नहीं होती है तो जिनसे होती है उन्हें करने दें क्या पता एक दिवस वे ही आपके कल्याणका माध्यम बन जाए !
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