पिछले कुछ माहमें कुछ पुलिसके अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ता एवं शिक्षकोंने आत्महत्या की है और इस समाचारने सभीको आश्चर्यचकित कर दिया; क्योंकि ये सभी अपने-अपने व्यावसायिक क्षेत्रमें सफल एवं सुप्रसिद्ध थे । समाचार सूत्रोंके अनुसार ऐसे पुरुषोंने गृह क्लेशसे व्यथित होकर आत्महत्या की थी ।
इतना ही नहीं, आज अनेक स्त्रियां, पुरुषोंको अपनी सुरक्षा हेतु बनाए गए विधानका (कानूनका) लाभ उठाकर उन्हें फंसा देती हैं जिससे बिना कारण ही कुछ पुरुषोंको कष्ट भोगना पडता है । आजके महानगरोंमें होनेवाले सम्बन्ध-विच्छेदमें भी स्त्रियोंके अहंकार अत्यधिक उत्तरदायी होते हैं । हमारे हिन्दू धर्ममें स्त्रियोंको सुसंस्कारित करनेपर अत्यधिक बल दिया जाता रहा है । पूर्वकालमें स्त्रियोंको शिक्षा एवं उनके धर्मपालनसे सम्बन्धित ज्ञान, घरकी स्त्रियां दिया करती थीं । सामान्य स्त्री अत्यधिक विदुषी न भी हो तो भी वे अपने गृह कार्यमें दक्ष होती थीं, उन्हें धर्म और साधनाका ज्ञान होता था । वे शास्त्रोंका भी नियमित अभ्यास करती थीं और उन्हें घरमें ही आनेवाले सन्तवृन्दसे धर्मकी शिक्षा भी मिल जाया करती थी । जो बालिकाएं विलक्षण होती थीं, उनकी शिक्षाकी विशेष व्यवस्था माता-पिता या ससुराल पक्षवाले अवश्य करते थे; इसका भी उल्लेख हमारे धर्मशास्त्रोंमें अनेक स्थानोंपर मिलते हैं ।
कालान्तरमें अंग्रेजोंद्वारा स्त्री शिक्षाके नामपर सर्वनाशी निधर्मी शिक्षाका प्रचार-प्रसार हुआ और इससे ही सर्व विसंगतियोंका जन्म होने लगा । स्त्री मुक्ति एवं स्त्री सशक्तिकरणके नामपर स्त्रियोंको स्वेच्छाचार हेतु प्रवृत्त किया जाने लगा और यहींसे समाजमें स्त्रियोंद्वारा उच्छृंखलताने जन्म लिया, जिसका परिणाम आज आप देख ही रहे हैं; इसलिए आगामी कालमें वैदिक गुरुकुलमें बालिकाओंको भी शिक्षा दी जाएगी जिससे समाजका यह महत्त्वपूर्ण वर्ग दिशाभ्रमित न हो ।
शास्त्र कहता है –
अपत्यं धर्मकार्याणि शुश्रूषा रतिरुत्तमा ।
दाराधीनस्तथा स्वर्गः पितॄणामात्मनश्च हि ॥ – मनुस्मृति ९.२८
गृहस्थ जीवनके सभी कार्य अर्थात संतानोत्पत्ति, धर्मकार्य, सेवा, उत्तम रति, पितरोंका उद्धार व स्वर्गके दिव्य सुखोंकी प्राप्ति – ये सब स्त्रीके ही अधीन हैं अर्थात स्त्रीके माध्यमसे ही सम्भव हैं ।
इसलिए स्त्रियोंकी शिक्षा एवं सुसंस्कारपर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए !
आजकल अनेक लोग अपनी पुत्रियोंका विवाह उन्हें आर्थिक रूपसे स्वावलम्बी बनानेके क्रममें बहुत विलम्बसे करते हैं, तबतक स्त्रीका अहं परिपक्व हो चुका होता है, आजका पुरुष वर्ग भी योग्य प्रकारसे साधना तो करता नहीं; इसलिए उन्हें भी अहंका प्रमाण बहुत अधिक होता है, ऐसेमें दो अहंकारी जीव गृहस्थीकी डोर सम्भालते हैं तो वह आरम्भ होते ही टूटनेकी कगारपर पहुंच जाती है । ऐसा न हो; इसलिए युवतियोंको अवश्य ही सुसंस्कारितकर, उनका विवाह २० से २५ वर्षकी आयुके मध्य करना चाहिए और पुत्रोंको भी धर्म और साधनाका ज्ञान माता-पिताने अवश्य देना चाहिए । मेरे पास अनेक बार लोग यह पूछने आते हैं कि कोई मंत्र बताएं जिससे मेरा सम्बन्ध-विच्छेद सरलतासे हो जाए । मैं यह सुनकर आश्चर्यचकित हो जाती हूं, ऐसे सभी लोगोंने ध्यान रखना चाहिए कि सम्बन्धको तोडना सरल होता है, उसे निभाना अत्यन्त कठिन होता है । बहुत ही विपरीत परिस्थिति हो और साथ रहना कदापि सम्भव न हो तो ही सम्बन्ध विच्छेदके पर्यायका चयन करना चाहिए, क्योंकि जिन दोषों या अहंकारके कारण आप इस गृहस्थीमें क्लेशमें हैं, पुनः विवाह करनेपर भी ऐसा ही होगा; इसलिए स्वयंमें सुधार करना, सहन करनेकी या त्याग करनेकी वृत्ति निर्माण करना, अपने अहंके लक्षणोंको दूर करने हेतु प्रयत्न करना, ये सुखी जीवनकी कुंजी हैं; सम्बन्ध-विच्छेद किसी समस्याका समाधान नहीं है ।
स्त्रियोंके लिए एकाकी जीवन व्यतीत करना अत्यन्त कठिन होता है, इसलिए शास्त्रोंमें स्पष्ट रूपसे स्त्रीको पुरुषपर आश्रित रहने हेतु बताया गया है; क्योंकि संन्यास धारण करना या एकाकी रहना स्त्रियोंके लिए असम्भव नहीं तो अत्यधिक कठिन अवश्य होता है । एक साधक प्रवृत्तिके व्यक्तिने अपनी पुत्रीका विवाह नहीं किया, जब मैंने पूछा, “आपने समय रहते अपनी पुत्रीका विवाह क्यों नहीं किया ?”, तो उन्होंने कहा, “ये मुझे गुरु मानकर साधना करना चाहती थी”, तो मैंने कहा, “क्या आपकी पुत्री संन्यासकी योग्यता रखती है ?, उसका आध्यात्मिक स्तर तो मात्र ४० % है, साधनाकी उतनी तीव्र उत्कंठा भी नहीं है, इसे तो विवाह न होनेके कारण, अवसाद हो गया है ।” उन्होंने सिर झुकाते हुए कहा, “हां, ये अवसाद ग्रस्त रहती है, मुझे अब अपनी चूकोंका भान हो रहा है ।” उनकी पुत्री बहुत अहंकारी है, वह किसीके साथ नहीं रह पाती है, माता-पिता अब वृद्ध हो चले हैं और वे अब अपनी पुत्रीको लेकर बहुत चिंतित रहते हैं । ऐसे ही एक अन्य व्यक्ति अपनी चार पुत्रियोंके विवाह न होनेसे अत्यधिक व्यथित थे और वे हमारे आध्यात्मिक उपचार केंद्रमें आए थे । वे बहुत गर्वसे अपनी पुत्रियोंकी उपलब्धियां बता रहे थे किन्तु उनकी किसी भी पुत्रीका विवाह नहीं हो रहा था, उनकी सबसे छोटी पुत्रीकी आयु २९ वर्ष थी । मैंने उनसे पूछा, “आपने अब तक अपनी किसी भी पुत्रीका विवाह क्यों नहीं किया ?” तो उन्होंने कहा, “मैंने सोचा वे पढ लिखकर स्वावलम्बी हो जाएं तो करेंगे किन्तु अब उन्हें जो पात्र अच्छा लगता है वे उन्हें पसंद नहीं करते हैं और जिन्हें हम पसंद करके उनसे मिलाते हैं, उन्हें वे अच्छे नहीं लगते हैं !” यह तो मैंने दो प्रसंग बताये हैं, मेरे पास ऐसे अनेक प्रकरण हैं । ध्यान रहे, जीवनकी प्रत्येक घटनाका समय निश्चित होता है, उस समयके निकल जानेपर वह कार्य सिद्धि होनेमें अत्यधिक अडचनें आती हैं; इसलिए विवाह समय अनुरूप ही करें, अपने क्रियमाणसे ऐसी चूकें न करें कि आपको जीवन भर पछताना पडे । – तनुजा ठाकुर
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