सूक्ष्म जगत – दोष निर्मूलनका महत्त्व


    उपासनाकी एक साधिका पिछले कुछ माहसे बहुत उत्कण्ठासे व्यष्टि व समष्टि साधना कर रही है । आपातकालको ध्यानमें रखते हुए हमारी संस्थाकी ओरसे ‘ऑनलाइन’ सत्संग एवं सामूहिक नामजप आरम्भ किया गया है । प्रायः एक माह नियमित सामूहिक नामजपमें सम्मिलित होनेपर पितृपक्षमें एक दिवस अकस्मात सामूहिक नामजपके समय उनसे भिन्न प्रकारकी मुद्राएं विशेषकर सकारात्मक मुद्राएं, जैसे प्रणाम मुद्रा, शरणागत मुद्रा इत्यादि होने लगीं । उन्हें ऐसा करते समय बहुत अच्छा लगता था और महाष्टमीके दिवस जब निशाकालमें हमने ‘ऑनलाइन’ सामूहिक नामजप रखा था तो जो शक्ति उनमें प्रकट होती थी, वे देवी समान युद्ध करने लगी, इससे उन्हें लगा कि कोई देवी उनमें प्रकट होकर उनसे ये मुद्राएं करवा रही हैं । वे जिस ‘व्हाट्सएप्प’ गुटमें हैं, उसमें सभी साधक सामूहिक नामजपके मध्य यदि कोई विशेष अनुभूति हो तो वे उसे भी लिखते हैं; इसलिए वे भी अपनी अनुभूतियां लिखने लगीं । उनकी अनुभूतियां कैसे होती थीं ?, यह आपको भी ज्ञात हो; इसलिए तीन अनुभूतियां आपसे साझा कर रही हूं ।
अनूभूतियां :
अ. दिनांक – १६.१०.२०२०, अधिक मास, आश्विन अमावस्या 
१.  प्रथम सत्रमें दोनों हाथोंकी अंगुलियां एक-दूसरेमें फंस गए और दोनों  हाथोंके अंगूठे, दोनों आंखोंके चारों ओर गोलाकार घूमकर मुद्रा हो रहा था ।
२. द्वितिय सत्रमें दोनों हथेलियां  एक-दूसरेमें फंसकर सिरके उपरसे नीचेतक एवं पुनः नीचेसे ऊपरतक घूमती रही, जैसे कि जल छिडक रहे हों; तालियां बजनेकी मुद्रा होने लगी; इसके उपरान्त अनेक क्रियाएं हुईं । भूमाताको वन्दन करने जैसी मुद्रा हुई ।
३. तृतीय सत्रमें पुनः तालियां बजानेकी कृति हुई और धीरे-धीरे उनकी तीव्रता बढने लगी ।  विविध प्रकारकी ध्वनि निकलनी लगी । जैसे युद्धपर निकलते समय मां दुर्गाके साथ गण वाद्य बजा रहे हों; पटाखे बजने जैसी भी ध्वनी हो रही थी; अनेकबार तालबद्ध ध्वनि निकल रही थी ।
 आरतीके समय अति सुन्दर नमस्कार जैसी अनेक क्रियाएं हुईं, जैसे भरतनाट्यममें होती है ।
आ. दिनांक – २३.१०.२०२०, शुद्ध आश्विन दुर्गा महाष्टमी 
१. आज महाष्टमीके दिवस अनेक क्रियाएं हुईं । हाथमें त्रिशूल लेकर, जैसे मां दूर्गा महिषासुरका मर्दन कर रही हैं, ऐसी क्रिया हुई; मुखपर क्रोधके भाव थे ।
     तत्पश्चात आनन्दके भाव जाग्रत हुए एवं देवी मांके प्रति अनेक बार नमस्कारकी मुद्रा हुई ।
 कुछ समय पश्चात चारों दिशामें शस्त्र चलानेकी क्रिया हो रही थी । नमस्कार क्रियाकी विविध मुद्रा हुई ।
    आरतीके समय असङ्ख्य बार तालियां बजानेकी कृति हुई, जिससे सम्पूर्ण घरमें गूंजने लगी ।
इ. दिनांक १.१.२०२०, कार्तिकमास शुद्ध प्रतिपदा
सामूहिक नामजपके प्रथम सत्र :  दोनों हाथ नमस्कार मुद्रामें जुड गए, पुनः खुलकर मुखपर कवचकी मुद्रा बन गई और नामजपकी ध्वनि जैसे गूंजने लगी । श्रीदत्तगुरुके प्रतिमापर नमस्कारकी मुद्रा हुई । हाथोंसे पुष्प अर्पण हुए । सहस्त्रार चक्रपर अनेक प्रकारके न्यासकी मुद्रा हुई । बायां हाथ आशीर्वादस्वरूप ऊपर उठता  रहा । पूर्ण सत्रमें न्यास होते रहे ।
द्वितिय सत्र : अनूभूतियां लिखनेके लिए सामने जो पुस्तिका रखी थी, उसपर मेरे प. पू. सद्गुरुकी प्रतिमा है । उनको नमस्कार हुआ । आरतीकी मुद्रा हुई । चरणोंपर पुष्प अर्पण हुए । हथेलियां  एक-दूसरेपर घिसकर सद्गुरु चरणपर कुछ अर्पण हो रही थी । भावजागृति होकर आंखोंमें अश्रु भर आए ।  पुनः दोनों  हाथ पूर्ण उपर उठकर जैसे दूर-दूरतक सभीको आशीर्वाद दे रहे हैं, ऐसी क्रिया हुई । तत्पश्चात बायां हाथ दाहिने ओर और दायां हाथ बाई ओर मुडकर आशीर्वादकी मुद्रा हुई ।
तृतीय सत्र : हाथ उपर उठकर सीधे खडा हो गया, तत्पश्चात शंखकी मुद्रा होकर श्रीसद्गुरुकी प्रतिमापर अभिषेक हुआ, तत्पश्चात आरती जैसी मुद्रा हुई । सामने ‘टैब’में (लघु चल-संगणक)  जो दत्तगुरुकी प्रतिमा थी, उनके चरणमें नमस्कार अर्पण हुआ ।   आरतीकी मुद्रा  प्रदान हुई ।  आशीर्वादके लिए हाथ ऊपर उठे, तत्पश्चात दोनों हाथोंमें, जैसे त्रिशूल पकडा था और नीचे भूमिपर काली शक्तिका विघटन हो रहा था । सामने, दायीं ओर तत्पश्चात पीछे, ऊपर-नीचे हाथोंकी मुद्रा हो रही थी ।
 कृतज्ञताके समय शरणागत मुद्रामें गए । नमस्कारके लिए शरीर झुक गया ।
        ऊपरकी अनुभूतियां पढकर किसीको भी ऐसा लगेगा कि कोई इष्ट शक्ति अर्थात देवी, उनमें प्रकट हो रही होंगी । गुरुकृपासे जैसे ही प्रथम दिवस उन्होंने अपनी मुद्रा विषयक अनुभूतियां बताईं तो ज्ञात हो गया था कि ये उनके ही कोई अतृप्त पूर्वज है, जो साधक वृत्तिकी हैं और सूक्ष्म जगतके किसी मान्त्रिक अर्थात बलाढ्य आसुरी शक्तिके वशमें है, जो उनके माध्यमसे साधना प्रकटकर अपनी माया फैला रही है । मैंने उस साधकसे ऐसा कुछ भी नहीं कहा और बहुत अच्छा बोलकर उनकी इस क्रियाको करते रहने दिया । एक-सवा माह जब हो गया और उस साधिकाको ऐसा भान होने लगा कि उनमें देवी आती है तो मैं उनके घर कुछ दिवसके लिए गई । एक दिवस प्रातः कार्तिक माहके ‘ऑनलाइन’ सामूहिक नामजपके समय मैं भी उनके बैठक कक्षमें पहुंची और उस शक्तिसे वार्तालाप आरम्भ किया; किन्तु उसने अपना मुख नहीं खोला । सूक्ष्मसे मुझे ज्ञात हो गया था कि वे उनकी दादी-सास हैं । मैंने जैसे ही उस शक्तिसे जो मुद्रा कर रही थी, उनसे उसके परिचयके विषयमें पूछा तो वे प्रथम तो कुछ नहीं बोली और मुझपर अपना क्रोध प्रकट किया; किन्तु कुछ ही क्षणोंमें उन्होंने स्वीकार किया कि वे उस स्त्रीकी दादी सास ही है । वे चूंकि साधक प्रवृत्तिकी थीं; इसलिए मैंने उन्हें सब समझाया कि कैसे वे ये मुद्राएं करके अपने परपोतेके घरमें एवं उनकी पत्नीके देहमें काली शक्ति भरकर उन्हें कष्ट देकर अपने पाप बढा रही हैं । जब मैंने उनके पति, जो वहीं उपस्थित थे, उनसे पूछा कि उनकी दादी कैसी थीं ?, तो उन्होंने कहा कि वे बहुत सात्त्विक थीं, सारे कुटुम्बमें सबसे प्रेम करती थीं, सबकी सहायता करती थीं; किन्तु उनके दादाजी बहुत ही तामसिक प्रवृत्तिके थे, उन्होंने अन्त्येष्टि श्राद्धके अतिरिक्त और कुछ भी उनके निमित्त कभी नहीं किया था ।
     वस्तुत:  उनका श्राद्ध भी ठीकसे नहीं हुआ था और उनकी कोई इच्छा रह गई होगी; इसलिए वे अतृप्त थीं और सबसे अधिक दुःखकी बात यह थी कि वे सूक्ष्म जगतमें एक मान्त्रिकके (बलाढ्य आसुरी शक्तिकी) बन्धक थीं और वह मान्त्रिक ही उन्हें उनके कुटुम्बको विशेषकर उनके परपोतेको एवं उनके घरवालोंको कष्ट देनेका निर्देश देकर अपनी शक्ति बढाता था और इसे भी उस शक्तिसे पूछनेपर उसने उसकी पुष्टि की । मैंने उस शक्तिसे कहा कि वे दत्तात्रेय देवताके शरण जाए, जिससे वे मान्त्रिकसे उसका रक्षणकर उन्हें सद्गति देंगे । उस शक्तिने ऐसा ही किया और जैसे ही वह मुक्त होने लगी, वे बहुत प्रसन्न हो गई, अपने कुटुम्बके सदस्योंद्वारा उनसे क्षमा याचना मांगनेपर उन्हें क्षमाकर आशीर्वाद देकर, वे चली गईं एवं पुनः प्रकट नहीं हुईं । जिस स्त्री साधिकामें यह शक्ति प्रकट हो रही थी, उन्हें पिछले एक सप्ताहसे बहुत थकावट अनुभव होकर भार घटने लगा था और उनकी बिटियाको भी मांके स्वास्थ्यमें कुछ तो समस्या है, यह भान होने लगा था । आपको बता दें, यह साधक-कुटुम्ब पूर्ण रूपसे उच्च शिक्षित एवं सभी उच्च पदोंमें सेवारत हैं !
 इस प्रसंगसे सीखनेको मिले कुछ तथ्य इसप्रकार हैं :
१. जिस घरमें नियमित श्राद्ध नहीं होता है, उनके घरमें पितर अतृप्त होकर अपने वंशजोंको कष्ट देते हैं ।
२. जो शक्ति प्रकट हो रही थीं, उनका आध्यात्मिक  स्तर ५६ % था अर्थात इतने उच्च स्तरपर भी यदि व्यक्तिके जीवनमें गुरु न हो या यदि वह योग्य साधना न करता हो तो मृत्यु उपरान्त अटक सकता है ।
३. उच्च आध्यात्मिक स्तरकी लिंगदेहको मान्त्रिक बन्धक बनाने हेतु विशेष रूपसे प्रयत्नशील रहते हैं; क्योंकि इससे उनकी शक्ति भी बढती है एवं वे उनसे उनकी साधनाके बलपर उनके वंशजोंको एवं विशेषकर जो अधिक सात्त्विक हों, उन्हें अधिक कष्ट दे सकते हैं और वह हो भी रहा था, उस स्त्री-साधिकाके घरमें सभी सदस्योंका आध्यात्मिक स्तर ५० % से अधिक है और सभीमें साधनाकी अत्यधिक उत्कण्ठा है, ऐसे लोग सूक्ष्म जगतके मान्त्रिकोंके विशेष लक्ष्य होते हैं ।
४. किसी भी व्यक्तिमें देवी मां कभी भी प्रकट नहीं होती हैं, वे सब या तो उनके पूर्वज होते हैं या कोई बलाढ्य आसुरी शक्ति; इसलिए उनकी मायामें कभी भी नहीं फंसना चाहिए । देवी तत्त्व मात्र उच्च कोटिके सन्तोंमें प्रकट होता है और वे कभी भी इसके विषयमें समाजको नहीं बताते हैं अर्थात उसे प्रकट नहीं करते हैं ।
५. गुरुकृपासे मुझे प्रथम दिवस ही ज्ञात हो गया था कि वह कोई अनिष्ट शक्ति है; किन्तु उनके घरके सदस्यों व सामूहिक नामजप गुटके सदस्योंको सिखाने हेतु मैंने यह बताया नहीं था ।  यदि सूक्ष्मका ज्ञान नहीं होता तो उनकी अनुभूतियोंसे कोई भी कहता कि वे कोई इष्ट शक्ति है । यह तो गुरुकृपा है कि सूक्ष्म जगतके ये गूढ तथ्य ज्ञात हो जाते हैं । इस हेतु मैं अपने श्रीगुरुके चरणोंमें मन:पूर्वक नमन करती हूं और उनकी कृपा ऐसे ही बनी रहे, यह उनके श्रीचरणोंमें प्रार्थना करती हूं ।
६. ऐसी अनिष्ट शक्ति मायावी होती हैं, वे प्रत्यक्षमें जिसमें प्रकट होती हैं, उन्हें यह विश्वास दिलाती हैं कि वे उनका भला कर रही हैं और वे इष्ट शक्ति हैं; किन्तु वे भीतर ही भीतर गुप्त रूपसे उन्हें कष्ट देती हैं, जैसा कि उस स्त्री साधिकाको वे दे रही थीं । उन्हें कुछ दिवसोंसे बहुत थकावट इसीकारणसे हो रही थी और चूंकि वे बहुत उत्कण्ठासे साधना कर रही थीं; इसलिए मुझे उनपर आध्यात्मिक उपचार करने हेतु उनके घर जाना पडा ।
७. सबसे अच्छी बात यह थी कि वह शक्ति मात्र १५ मिनिटमें ही उनके देहको छोडकर चली गईं ।  मुझे तो लगा था कि मान्त्रिकद्वारा पोषित हैं; इसलिए उस शक्तिको सद्गति मिलनेमें कष्ट होगा; किन्तु ऐसा नहीं हुआ और उसका कारण जब मुझे ज्ञात हुआ तो मेरा मन मेरे श्रीगुरुके प्रति कृतज्ञतासे भर उठा ! वह स्त्री पिछले चार माहसे स्वाभावदोष निर्मूलनकी प्रक्रिया कर रही थीं; इसलिए उनके देहमें गुरु तत्त्वका प्रवेश त्वरित हो गया और वह शक्ति जो उनके घरमें विशेषकर उनके पतिको ४० वर्षसे कष्ट दे रही थीं, वे निकल गईं ।
८. उच्च कोटिकी लिङ्गदेह भी किसी सात्त्विक जीवको अपनी सद्गति हेतु ढूंढती हैं और वे उन्हें कष्ट उनका ध्यान आकर्षित करने हेतु उन्हें कष्ट देती हैं ।
९. अतृप्त लिङ्गदेह उनके पास अपने गति हेतु आती हैं, जो उनके बहुत प्रिय होते हैं, इस लिङ्गदेहको भी उनका परपौत्र बहुत प्रिय था; इसलिए वे उसे पिछले ४० वर्षसे कष्ट दे रही थीं, जिसके अन्तर्गत वह व्यावहारिकके साथ उनके आध्यात्मिक जीवनमें अडचनें निर्माणकर उनकी आध्यात्मिक प्रगति अवरुद्ध कर रही थीं । उनका परपौत्र वर्तमान समयमें ५६ % आध्यात्मिक स्तरपर है ।
१०.  इस प्रसङ्गसे जीवनमें किसी जीवित अध्यात्मविदका भी होना आवश्यक है, यह ज्ञात होता है ! ये दोनों पति-पत्नी किसी गुरुसे दीक्षित तो हैं; किन्तु अभी इनके जीवनमें उन्हींके आध्यात्मिक सामर्थ्य अनुरूप कोई स्थूल मार्गदर्शक नहीं है; इसलिए उनके गुरुके देहत्याग उपरान्त, उन्हें यह सब क्यों हो रहा था ?, यह बतानेवाला कोई नहीं था !


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2017. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution