अपने साक्षात्कारसे पूर्व श्रीगुरुने अपने लेखनद्वारा दी अपनी आध्यात्मिक सामर्थ्यकी प्रतीति


मुम्बईमें दिसम्बर १९९६ में एक दिवस जब मैं अपने कार्यालयसे अपने एक निकट सम्बन्धी संग लौट रही थी, तब अकस्मात् वर्षा होने लगी । हम वर्षासे छुपनेके लिए  एक देवालयमें (मंदिरमें) चले गए, वहां मैंने एक फलक(बैनर) देखा, वह ‘सनातन संस्था’का फलक था, जिसमें उस देवालयमें होनेवाले सत्संगकी जानकारी थी; परन्तु उस फलकमें जो लिखा था, उसने मुझे अत्यधिक आकृष्ट किया और वह था – ‘अच्छा साधक कैसे बनें ? एवं शंका समाधान’ । मेरे मनमें अनेक शंकाएं थीं और एक अच्छा साधक भी बनना चाहती थी; अतः मैंने उस सत्संगमें जानेका निश्चय किया और इस प्रकार उस सत्संगके माध्यमसे मुझे कुछ माह उपरान्त मेरे श्रीगुरुका साक्षात्कार हुआ ।
एक विशेष तथ्यका यहां मैं उल्लेख करना चाहूंगी कि मेरे निकट सम्बन्धीको साधना इत्यादिमें कुछ विशेष जिज्ञासा नहीं थी, वे एक भोगी प्रवृत्तिके व्यक्ति थे; किन्तु वे मुझे साधना करते देखते थे; अतः वे भी साधना कर सकते हैं, यह सिद्ध करने हेतु वे सत्संगमें नियमित जाने लगें, यद्यपि कुछ माह जानेके पश्चात् उन्होंने साधना छोड दी, वहीं मैं चाहकर भी अगले चार महीने सत्संगमें नहीं जा पाई । प्रत्येक सप्ताह सदैव कोई न कोई अडचन, सत्संगके दिवस आ जाता और मैं सत्संगके समय जैसे अटक जाती और चाह कर भी नहीं वहां नहीं जा पाती; जिसका मुझे क्षोभ होता ।
इसी मध्य मेरे उस निकट सम्बन्धीने सत्संगसे परम पूज्य गुरुदेवकी लिखी हुई ग्रन्थ ‘अध्यात्मका प्रस्तावनात्मक विवेचन’ मेरे लिए लेकर आए । मुझे पढना अच्छा लगता था और उन्हें पुस्तक पढनेमें कोई रुचि नहीं थी; अतः पैंतालिस रुपए देकर उस धार्मिक ग्रन्थको लेकर आना, मेरे लिए एक आश्चर्यजनक और सुखद घटना थी । अप्रैल १९९७ की एक बुधवारकी रात्रि साढे ग्यारह बजे, मैं लेटे-लेटे, उस ग्रन्थके पृष्ठ पलटने लगी, मध्यके पृष्ठके दो-चार पंक्तियोंने मुझे इतना आकृष्ट किया कि मैंने बैठकर दो घंटेमें सम्पूर्ण ग्रन्थको पढा, ग्रन्थ पढते समय मुझे इतना आनन्द हो रहा था कि ऐसा लगा रहा था कि जैसे मेरे मनमें उभरने वाले अनेकों प्रश्नोंके उत्तर मुझे मिल रहे हों । मैं ग्रन्थ पढते-पढते अनेक बार परम पूज्य गुरुदेवका छायाचित्र जो उसके प्रथम पृष्ठपर था, उसे निकालकर देखती; और मेरा मन श्रद्धासे जुख जाता । मुझे बार-बार लगता यह ग्रन्थ लिखनेवाला लेखक, कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हो सकता, यह तो कोई ऋषि तुल्य व्यक्ति ही लिख सकते हैं; किन्तु ग्रन्थमें उनका छायाचित्र एक शर्ट पहने हुए सामान्य व्यक्ति समान था; अतः अध्यात्मके ग्रन्थके गूढ सारको सूत्ररूपमें बताना एवं उनका सामान्य व्यक्ति समान वेशभूषा दोनों मेल नहीं खा रहे थे; किन्तु मुख मण्डलपर एक दिव्य तेजका भान मुझे अवश्य हो रहा था; जिसकारण मैंने उनके प्रति न चाहकर भी शरणागत हो रही थी  ।
ग्रन्थ पढनेके पश्चात् मैंने उनसे कहा “अब तो आपसे भेंट कर, आपके दर्शन प्राप्त करना ही होगा” और अगले दिवस मैंने साप्ताहिक सत्संगमें जानेका निश्चय किया । और आश्चर्य यह है कि अगले साप्ताहिक सत्संगमें जानेमें मुझे कोई अडचन नहीं आई । वस्तुत: उस ग्रन्थमें निहित चैतन्यके कारण मुझपर आध्यात्मिक उपाय हुआ एवं जो भी अनिष्ट शक्तियां सत्संगमें जाने हेतु मेरा मार्ग अवरुद्ध कर रही थीं, उसके कष्ट स्वतः ही दूर हो गए ।
आज अनेक सन्त सनातन संस्थाके ग्रन्थोंको कलियुगके वेदकी उपमा दे रहे हैं और यह मेरा सौभाग्य है कि ऐसे ही एक वेदरुपी धर्मग्रन्थने मेरे श्रीगुरुसे मेरे साक्षात्कार करनेका मार्ग प्रशस्त किया । जिस गुरुके लेखनमें इतनी शक्ति है, वे गुरु कैसे होंगे, इसकी कल्पना करना, यह मानव बुद्धिके लिए सम्भव ही नहीं ।
आज मुझे ज्ञात होता है कि अनिष्ट शक्तियां मेरा मार्ग अवरुद्ध क्यों कर रही थीं और मैंने अपने अध्यात्मिक शोधमें यह पाया है कि जिस साधकको अध्यात्ममें आगे जाना होता है या उसके माध्यमसे धर्मकार्य (समष्टि कार्य) होना होता है, उसे आसुरी शक्तियां निश्चित ही कष्ट देकर उनके मार्गमें अडचनें निर्माण करती हैं; किन्तु सर्वशक्तिमान सत्ताके आगे एक दिवस उन शक्तियोंको नतमस्तक होना ही पडता है; मात्र साधकमें साधना हेतु तीव्र उत्कंठा होनी चाहिए ।
इस प्रसंगसे अध्यात्मशास्त्र एवं सूक्ष्म जगतसे सम्बंधित कुछ तथ्य जो उद्घाटित होते हैं वे इसप्रकार हैं –
१. सूक्ष्म जगतकी बलाढ्य अनिष्ट शक्तियां अत्यधिक सतर्कतासे साधकको कष्ट देनेका या उनकी साधनामें अडचनें निर्माण करनेका प्रयत्न करती हैं, उन्हें भूत एवं भविष्य ज्ञात होनेके कारण यह सम्भव होता है ।
२. व्यष्टि साधना करनेकी अपेक्षा समष्टि साधना करनेवाले साधकोंको अनिष्ट शक्तियां अधिक प्रमाणमें कष्ट देती हैं या उनके साधनाके मार्गको अवरुद्ध करनेका प्रयास करती हैं; क्योंकि उन्हें ज्ञात होता है कि इससे उनकी आसुरी साम्राज्यको स्थूल और सूक्ष्म जगतमें हानि पहुंच सकती है ।
३. परात्पर स्तरके सन्तोंके लेखनमें सत्यताका प्रमाण अधिक होनेके कारण उसमें चैतन्यका प्रमाण अधिक होता है जिसकारण उनके लेखन अनेक सहस्र वर्षों या अनके युगों तक समाजका मार्गदर्शन करनेका सामर्थ्य रखते हैं; हमारे वेद, उपनिषद् आदि ग्रन्थ इसके प्रमाण हैं ।
३. सन्तोंके लेखनमें अनिष्ट शक्तिसे पीडित साधकोंपर आध्यत्मिक उपाय करनेकी शक्ति होती है ।
४. गुरुतत्त्व एक सर्वज्ञ ईश्वरीय तत्त्व होनेके कारण, आवश्यकता अनुरूप, साधक या शिष्य हेतु क्रियाशील होकर उसे योग्य मार्गदर्शन देते हैं ।
५. तीव्र उत्कंठा होनेपर ईश्वर साधककी अवश्य ही सहायता करते हैं एवं अनिष्ट शक्तियां कितनी भी शक्तिशाली हो वे परमेश्वरसे अधिक शक्तिशाली नहीं होती हैं ।  – तनुजा ठाकुर  (३.१०.२०१७)



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