सर्वोच्च न्यायालयने हडकाया केरलके वामपन्थी शासनको विधानसभामें सम्पत्ति नष्ट करनेपर


२९ जुलाई, २०२१ 
       सर्वोच्च न्यायालयने बुधवार,२८ जुलाईको केरल शासनको हडकाते हुए कहा है कि विधानसभामें सम्पत्ति नष्ट करनेकी घटनाको सदनमें बोलनेकी स्वतन्त्रताके समान नहीं माना जा सकता है ।
यह विषय मार्च २०१५ का है । उस समय ‘सीपीआई’ (एम) के नेतृत्ववाला ‘एलडीएफ’ विपक्षमें था । कांग्रेसके नेतृत्वमें ‘यूडीएफ’ शासनके तत्कालीन वित्त मन्त्री केएम मणिको ‘बजट’ भाषण प्रस्तुत करनेसे रोकनेकी प्रयासमें तत्कालीन ‘माकपा’ विधायकोंने सदनमें बहुत उपद्रव किया था ।
न्यायमूर्ति ‘डी वाई’ चंद्रचूड और न्यायमूर्ति ‘एमआर’ शाहकी पीठने केरल राज्य और आरोपियोंकी विशेष अनुमति याचिकाओंको अस्वीकृत करते हुए केरल न्यायालयके १३ मार्चके निर्णयको स्थिर रखते हुए कहा, “विशेषाधिकार और प्रतिरक्षा आपराधिक नियमसे छूटका ‘दावा’ करनेका प्रवेश द्वार नहीं है और यह नागरिकोंके साथ विश्वासघात होगा । सम्पूर्ण ‘वापसी’ आवेदन अनुच्छेद १९४ की अनुचित धारणाके आधारपर किया गया था ।”
 सर्वोच्च न्यायालयने इस विषयमें १५ जुलाईको सुनवाई पूरी करनेके पश्चात निर्णयको सुरक्षित रख लिया था । न्यायमूर्ति ‘डीवाई’ चंद्रचूडने केरल शासनसे पूछा था, “क्या लोकतन्त्रके मन्दिरमें चीजोंको फेंकना और उन्हें नष्ट करना न्यायके हितमें है ?”
            इतने लम्बे अन्तरालके पश्चात भी इन स्वार्थी नेताओंको कोई विशेष दण्ड नहीं मिला और यह सब प्रपत्रोंमें ही दिखाया जाता है; इसलिए जनताका विश्वास आजकी न्याय प्रणालीसे उठ चुका है । इसे ठीक करने हेतु अब, विसंगतिपूर्ण लोकतन्त्रके स्थानपर हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना अनिवार्य है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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