मुसलमानोंको नहीं दे सकते ‘पिछडे’ वर्गके विशेषाधिकार, सर्वोच्च न्यायालयमें ‘सच्चर’ समितिके विरुद्ध आवेदन-पत्र प्रविष्ट
३० जुलाई, २०२१
कांग्रेस शासनद्वारा वर्ष २००५ में गठित की गई ‘सच्चर’ समितिके विरोधमें एक आवेदन-पत्र प्रविष्ट किया गया है । इस समितिकी वैधताको लेकर ‘सनातन वैदिक धर्म’के एक हिन्दूवादी समूहके ६ लोगोंने सर्वोच्च न्यायालयमें यह प्रार्थना-पत्र लगाया है ।
‘सच्चर’ समितिका गठन बिना किसी ‘कैबिनेट’के मन्त्रीके परामर्शके किया गया था । यह पूर्णरूपेण तत्कालीन प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंहके कार्यालयद्वारा लिया गया निर्णय था ।
आवेदनपत्रमें यह तर्क दिया गया कि संविधानके अनुच्छेद १४ और १५ के अनुसार किसी भी समुदायके साथ पृथक व्यवहार नहीं किया जा सकता है । आवेदनमें कहा गया, “मुसलमान समुदाय किसी विशेष व्यवहारका अधिकारी नहीं है; क्योंकि वह दीर्घ कालतक शासक थे और यहांतक कि ‘ब्रिटिश’ शासनके मध्य भी उन्होंने ‘सत्ता’का आनन्द लिया; यद्यपि हिन्दू समुदायके ‘एससी/एसटी’ वर्ग और ‘ओबीसी’को प्रताडित किया गया, नरसंहार किया गया और लोभ देकर एवं बलपूर्वक उनका धर्म परिवर्तन कराया गया ।”
ऐसे हिन्दुत्वनिष्ठ सङ्गठनोंको साधुवाद कि वे प्रत्येक हिन्दूविरोधी गतिविधियोंके विरुद्ध मुखर होकर अपना स्वर उठाते हैं; क्योंकि राजनीतिक दलोंने तो भारतको नष्ट करनेमें कोई कमी नहीं छोडी है । हिन्दू समाजको चाहिए कि वे ऐसे सङ्गठनोंको अपना सहयोग दें, जिससे हिन्दू एकताका ध्वज सदैव लहराता रहे और सभी राष्ट्रद्रोहियोंके षड्यन्त्रको विफल कर पाएं । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : डू पॉलिटिक्स
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