स्वस्थ रहने हेतु कुछ महत्त्वपूर्ण सूत्र (भाग-१४)


उष्ण (गर्म) जलकी अपेक्षा शीतल जलसे स्नान करना अधिक हितकारी क्यों होता है ? (भाग-आ)

हमारी त्वचामें लाखों रोम-कूप हैं, जिनसे स्वेद निकलता रहता है । इन रोम कूपोंको जहां पर्याप्त प्राणवायुकी आवश्यकता होती है, वहीं उन्हें पोषक तत्त्वोंकी भी आवश्यकता होती है; किन्तु, हमारी त्वचापर प्रतिदिन धूल, मैल, धुआं और स्वेदसे मिलकर जो मैल एकत्रित होता है, उससे हमारी त्वचाकी सुन्दरता और आभा नष्ट हो जाती है । त्वचाकी स्वच्छताका कार्य शीतल जलसे स्नान ही करता है । योग और आयुर्वेदमें शीतल जलसे स्नानके प्रकार और लाभ बताए गए हैं । अधिक समयतक और अच्छेसे स्नान करनेसे जहां थकान और तनाव घटता है, वहीं यह मनको प्रसन्नकर स्वास्थ्यके लिए भी लाभदायी सिद्ध होता है ।

उष्ण जल शीशपर डालकर स्नान करना आंखोंके लिए हानिकारक है; परन्तु शीतल जल लाभदायक है । साथ ही मुखपर उष्ण जलके पडनेसे शीघ्र झुर्रियां आती हैं ।

ऋतु अनुसार जलका प्रयोग करना चाहिए, इसका यह अर्थ नहीं कि शीतऋतुमें हम अधिक उष्ण जलसे ही स्नान करें । उष्ण पानीसे स्नान करनेपर रक्त-संचार पहले कुछ उत्तेजित होता है; किन्तु उसके पश्चात मन्द पड जाता है; परन्तु शीतल जलसे स्नान करनेपर रक्त-संचार पहले मन्द पडता है और उसके पश्चात उत्तेजित होता है, जो कि लाभदायक है । रोगीको या निर्बल मनुष्यको भी अधिक उष्ण जलसे स्नान नहीं करना चाहिए ।

शीतल या ठण्डे जलद्वारा स्नान करनेसे उश्नावात, सुजाप, अपस्मार (मिर्गी), उन्माद, धातुरोग, हिस्टीरिया, मूर्च्छा और रक्त-पित्त आदि रोगोंमें अधिक लाभ होता है ।



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