१ अ. स्वेच्छाका वर्तन : कोई स्वैराचारी अर्थात् स्वेच्छासे वर्तन करनेवाला घरपर कैसा व्यवहार करता है, इसका समाजसे कोई सम्बन्ध नहीं होता; किन्तु जब वह समाजमें स्वेच्छाका वर्तन करने लगता है, तब उसके विकृत व्यवहारका समाजपर दुष्परिणाम होता है । समाजको स्वस्थ बनाए रखना, यह सभीका कर्तव्य है । समाज अच्छा हो तो ही राष्ट्रका रक्षण कर सकता है । राष्ट्र रहे तो ही समाज रहता है, समाज रहे तो ही व्यक्ति रह सकता है । इससे व्यक्तिस्वातंत्र्य, यह शब्द कितना अयोग्य है, यह समझमें आता है । स्वेच्छाका वर्तन अधोगतिकी ओर ले जाता है; कारण यहां ‘मैं’ अर्थात् ‘अहम्’ यह केन्द्र बिंदु होता है । व्यक्तिस्वातंत्र्यके कारण ही आजके समाजकी स्थिति जितनी दयनीय हुई है, उतनी पहले कभी नहीं थी ।
१ आ. परेच्छासे वर्तन : समाजमें कैसा वर्तन किया जाए, इसका ज्ञान न होनेपर सज्जन व्यक्तिके कहे अनुसार वर्तन करें, जिससे समाजस्वास्थ्यकी रक्षा होती है । इसे परेच्छाका वर्तन कहते हैं।
१ इ. ईश्वरेच्छा अनुसार वर्तन : अगले चरणपर सज्जन या साधक अथवा संतोंके कहे अनुसार वर्तन करें । इससे समाज सात्त्विक होगा । ऐसे वर्तनको ईश्वरेच्छाका वर्तन कहते हैं । इसका एक और लाभ अर्थात् साधना होने लगती है।
२. मुसलमानोंका कुरानकी आज्ञानुसार वर्तन : मुसलमान कुरानकी आज्ञानुसार वर्तन करते हैं । वे कभी व्यक्तिस्वातंत्र्य इस शब्दका उच्चारण भी नहीं करते । इससे जगमें वे सामर्थ्यवान दिखाई देते हैं । संक्षेपमें कहें तो व्यक्तिस्वातंत्र्य नरककी और तथा ईश्वरेच्छा अनुसार वर्तन मोक्षकी ओर ले जाता है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले (२.११.२०१४)
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