तेरा तुझको अर्पण


मेरे आराध्य, भगवान शिवकी मुझ अधमपर सदैव ही बडी कृपा रही है, मुझे सदैव, उन्होंने मेरी पात्रतासे अधिक दिया है और क्षमतासे अधिक सर्व करवा कर लिया है, इस हेतु मैं उनकी कृतज्ञ हूं | अभी तक उन्होंने जो भी दिया है, उसे उन्हींको साक्षी मानकर, उनके श्रीचरणोंमें सदैव ही अर्पित करनेका प्रयास करती रही हूं और उनकी विशेष कृपा रही है कि उन्होंने उसे सदैव तत्क्षण स्वीकार भी किया है, आज उनका ही दिया हुआ दो उपनाम पूज्या और परात्पर गुरु, उनके श्रीचरणोंमें समर्पित करती हूं |
मैं सदैव ही एक साधक बनकर रहना चाहती थी और भविष्यमें मात्र साधक ही बनकर रहना चाहती हूं | अध्यात्ममें मैं कुछ भी पाने हेतु कभी नहीं आई थी अपितु अपना सर्वस्व उनके श्रीचरणोंमें लुटाने आई थी और वे जानते तो हैं ही कि मैं मात्र वैदिक सनातन धर्मकी एक सामान्य सी सेविका बन अपने अंतिम क्षण तक उसकी सेवा करना चाहती हूं | आशा करती हूं मेरे भोलेनाथ, मेरे इस विनती एवं उनके ही दिए हुए इस उपहारको स्वीकार कर मुझे कृतार्थ करेंगे एवं जिसप्रकारसे वे पिछले अनेक वर्षोंसे मेरा सूक्ष्मसे मार्गदर्शन कर रहे हैं, मेरा अनिष्ट शक्तियोंसे रक्षण कर रहे हैं, मुझसे अल्पांश प्रमाणमें धर्मकार्य करवा कर ले रहे हैं, उसी प्रकार उनका वरदहस्त इस मूढपर सदैव बना रहेगा और वे मेरी इस धृष्टताको क्षमा कर, मुझे अभयदान देंगे ! अतः आप सभीसे नम्र विनती है कि मुझे आजसे पूज्या या परात्पर गुरु इत्यादिसे संबोधित न करें; क्योंकि जो अर्पण कर दिया जाता है, उसका प्रयोग नहीं करना चाहिए ऐसा शास्त्र है | जो साधक मुझे मांके रूपमें संबोधित करते हैं, वे कर सकते हैं क्योंकि यह सम्बोधन संतोंने आपको करनेकी आज्ञा दी है और मुझमें वह सामर्थ्य नहीं कि मैं किसी संतकी अवज्ञा कर सकूं | – तनुजा ठाकुर



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