अनुपम वीरता और कुशल नेतृत्वके प्रतीक – तात्या टोपे


तात्या टोपे, जो ‘तांतिया टोपी’के नामसे भी विख्यात हैं, ख्रिस्ताब्द १८५७ के स्वतन्त्रतासंग्रामके उन महान् सैनिक नेताओंमेंसे एक थे, जो प्रकाशमें आए । ख्रिस्ताब्द १८५७ तक लोग इनके नामसे अपरिचित थे, परन्तु १८५७ की नाटकीय घटनाओंने उन्हेंअनायास अन्धकारसे प्रकाशमें ला खडा किया । इस महान विद्रोहके प्रारम्भहोनेसे पूर्व वह राज्यच्युत पेशवा बाजीराव द्वितीयके सबसे बडे पुत्र, बिठूरके राजा नाना साहबके एक प्रकारके साथी मात्र थे; किन्तुस्वतन्त्रता संग्राममें कानपुरके सम्मिलित होनेके पश्चात् तात्या पेशवाकी सेनाके सेनाध्यक्षकी स्थितितक पहुंच गए । उसके पश्चात्वर्ती युद्धोंकी सभी घटनाओंने उनका नाम सबसे आगे एक पुच्छल तारेकी भांति बढाया, जोअपने पीछे प्रकाशकी एक लम्बी रेखा छोडता गया । उनका नाम केवल देशमें हीनहीं वरन् देशके बाहर भी प्रसिद्ध हो गया । मित्र ही नहीं, शत्रु भी उनके सैनिक अभियानोंको जिज्ञासा और उत्सुकतासे देखने और समझनेका प्रयास करतेथे, समाचार-पत्रोंमें उनके नामके लिए विस्तृत स्थान उपलब्ध था, उनकेविरोधी भी उनकी प्रशंसा करते थे ।

१८५७ के दो विख्यात वीरों, झांसीकी रानी और तात्या टोपेमेंसे झांसीकी रानीको अत्यधिक ख्याति मिली । उनके नामके चारों ओर यशका चक्र बन गया;किन्तु तात्या टोपेके साहसपूर्ण कार्य विजय अभियान रानी लक्ष्मीबाईके साहसिक कार्यों और विजय अभियानोंसे किसीप्रकार न्यून रोमांचक नहीं थे । रानी लक्ष्मीबाईके युद्ध-अभियान जहां केवल झांसी, कालपी और ग्वालियरके क्षेत्रोंतक सीमितरहे थे, वहां तात्या एक विशाल राज्यके समान कानपुरके राजपूताना और मध्यभारततक फैल गए थे । तात्याने अन्य सभीनेताओंकी अपेक्षा शक्तिशाली ब्रिटिश शासनकी आधारशिलाको (नींवको) हिलाकर रख दिया था । उन्होंने शत्रुके साथ लम्बे समयतक संघर्ष किया । जब स्वतन्त्रता-संघर्षके सभी नेता एक-एक करके अंग्रेजोंकी सैनिक-शक्तिसे पराभूत हो गएतो वे अकेले ही विद्रोहकी पताका फहराते रहे । उन्होंने सतत् नौ मासतक कई ब्रिटिश अधिकारियोंको छकाया जो उन्हें पकडनेका प्रयास कर रहेथे । वे अपराजेय ही बने रहे । यह तो विश्वासघात था जिसके कारण अंग्रेज उन्हेंअन्तमें ७ अप्रैल, १८५९को बन्दी पाए । इस क्रांतिवीरका अन्त १८अप्रैल, १८५९ को हुआ जब अंग्रेजोंने इन्हें फांसीपर लटका दिया । देशके प्रथम स्वतन्त्रता-संग्रामको चिरस्मरणीय बनानेवाले इस महान् देशभक्तकी उपलब्धियां इतिहासके पन्नोंपर स्वर्णाक्षरोंसे लिखीगई हैं । उनके शौर्यकी गाथा महानता और संघर्षसे भरी हुई है एवं रोमांचक तथा प्रेरक है । वैदिक उपासना पीठकी ओरसे इस स्वतन्त्रता संग्रामके इस महान सेनानायकको विनम्र श्रद्धांजलि !



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