कृत्रिम शीतपेयको (कोल्डड्रिंक) छोड, प्राचीन पेय पदार्थको लानेकी तैयारी, करेगा तनावको समाप्त !


जनवरी ९, २०१९

प्राचीन समयमें किसानोंद्वारा स्वास्थ्य लाभके लिए पिया जाने वाला एक विशेष प्रकारका पेय पदार्थ शीघ्र ही आपके सामने आ सकता है । शोधमें तनाव अल्प करने और आंतोंका कार्य अच्छा करनेकी बात ज्ञात होनेके पश्चात दुग्ध उद्योगकी कंपनी ‘अमूल और एम.एस. यूनिवर्सिटी’ शीघ्र ही इस पेय पदार्थका विक्रय आरम्भ कर सकता हैं ।

‘एम.एस. यूनिवर्सिटी’के शोधकर्ताओंने इस पेयपदार्थके भण्डारण और उपयोगकी अवधिको बढानेके विज्ञानको ‘पेटेंट’ करा लिया है । भिन्न-भिन्न राज्योंमें विभिन्न नामोंसे जानी जानेवाले इस पेयके प्रयोगसे तनावको न्यून करनेमें भी सहायता मिलती है ।

राजस्थानमें ‘रबडी छाछ’ और महाराष्ट्रमें ‘अम्बिल’के नामसे प्रसिद्ध इस पेयको पारम्परिक रूपसे भीगे हुए धानसे बनाया जाता है । पहले छाछमें चावलको पूरी रात्रि डालकर अगले दिवस घरमें पीनेके लिए दिया जाता है । यद्यपि समयके साथ कोका-कोला और अन्य कृत्रिम शीतपेयके (कोल्ड ड्रिंक्स) बढते प्रयोगसे इस पेय पदार्थके उपयोगमें भारी गिरावट आई है ।


शोधकर्ताओंने पेय पदार्थको २९० लोगोंके समूहपर परीक्षण किया और तनाव स्तर अल्प हुआ । इसके साथ ही प्रतिदिनके व्यवहारमें भी केवल ३० दिनोंमें ही परिवर्तन देखनेको मिला । खाद्य एवं पोषण विभागमें मिनी सेठके निर्देशनमें शोध करनेवाली पीएचडी स्नातक श्रुति द्विवेदीने कहा, “हमने देखा कि समूहमें तनाव उत्पन्न करनेवाले अन्तःस्राव (हॉर्मोन) कॉर्टिसोलके स्तरमें ४.२% की न्यूनता आई है । इसके साथ ही शरीरमें अच्छे जीवाणुकी संख्यामें भी वृद्धि देखनेको मिली ।”

शोधकर्ताओंने केवल दो दिनोंतक प्रयोग किए जा सकनेवाले पेयकी अवधि बढानेकी तकनीकमें भी सफलता प्राप्त कर ली है । तीन वर्षों तक चले शोधके पश्चात एमएसयू दलने अमूलके साथ मिलकर पेय पदार्थकी पोषक गुण वृद्धिके लिए इसे ‘टेट्रापैक’ कर दिया । पेयके मूल्यके लिए विभिन्न आयु वर्गके १०० लोगोंपर किए गए शोधमें ज्ञात हुआ कि अधिकतर लोग २०० मिलीलीटरके लिए २० रुपये तक देनेको तैयार हैं । वहीं ९४ प्रतिशत लोगोंने पेयके विपणिमें उपलब्ध होनेपर कमसे कम एक बार क्रय करनेकी बात कही ।

 

“चरक, शुश्रुतके ज्ञानसे परिपूर्ण आजका हिन्दुस्तान रोगी और उद्विग्न है; क्योंकि वह अपने सांस्कृतिक मूल्योंको विस्मृत कर चुका है ! पूर्वजोंका ज्ञान उसके लिए निराधार है और आजका तथाकथित विज्ञानको ही सत्य मानता है; परन्तु अब जब सभी प्रयास विफल हो चुकें हैं तो वह अपने प्राचीन विज्ञानकी ओर ही मुड रहा है, यह केवल एक आरम्भ मात्र है । शनैः शनैः हम अपने प्राचीन मूल्यों और स्वाभिमानके सूर्योदयकी ओर मुडेंगें ।”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : नभाटा



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