उमर अब्‍दुल्‍ला बोले- यदि १९४७ में हमने सन्धि मान ली होती तो कश्‍मीरमें नहीं होते ऐसी स्थिति


जुलाई २८, २०१८

जम्मू कश्मीरके पूर्व मुख्यमन्त्री और नेशनल कॉन्फ्रेंसके नेता उमर अब्दुल्लाने घाटीमें हो रही हिंसक घटनाओंके पीछे बडा कारण बताया है । उन्होंने कोलकातामें एक कार्यक्रममें कहा कि यदि १९४७ की सन्धिका सम्मान होता तो जम्मू कश्मीरमें ऐसी परिस्थिति नहीं होती । अब्दुल्लाने कहा, ‘इतिहास प्रश्नोंसे भरा हुआ है; लेकिन यदि हम १९४७ में जम्मू कश्मीरको लोगों और संगठनके मध्य हुए सन्धिका सम्मान करते तो हमें आज जम्मू कश्मीरमें रक्तपात नहीं देखना पडता । हमारे निकटवर्ती देशने हमारा जीवन बहुत कठिन बना दिया है ।’

इसके अतिरिक्त उन्होंने कहा कि इस समय भारत उतना शक्तिशाली देश नहीं है, जितना उसे होना चाहिए । उमरने कहा, ‘एक शक्तिशाली देशके लिए शक्तिशाली संगठनका होना बहुत आवश्यक होता है; लेकिन संगठन राज्योंको दावमें लगाकर शक्तिशाली नहीं बन सकता । ऐसा कहां कहा जाता है कि एक शक्तिशाली संगठनके लिए अशक्त राज्य होने चाहिए ? आपका संगठन तभी शक्तिशाली होगा, जब आपके राज्य शक्तिशाली होंगे ! आज भारत उतना शक्तिशाली नहीं है, जितना उसे होना चाहिए । हम लोग बहुत सी विकट परिस्थितियोंका सामना कर रहे हैं, जैसे कई राज्योंमें नक्सलकी समस्या है, उत्तर-पूर्व और जम्मू कश्मीरमें भी समस्या है । अशक्त राज्य संगठनको उतनी प्रगतिसे आगे नहीं बढने दे रहे हैं, जितना कि होना चाहिए ।’

कोलकाताके इस कार्यक्रमके बाद समाचार माध्यमोंसे वार्ता करते हुए पश्चिम बंगालकी मुख्यमन्त्री ममता बनर्जीके ‘फेडरल फ्रण्ट’में सम्मिलित होनेके प्रस्तावपर अब्दुल्लाने कहा कि इस बारेमें चर्चा की जा रही है कि मतदानमें किस तरह से क्षेत्रीय दल भाजपाका सामना कर सकती हैं । उन्होंने कहा, ‘ममता दीदीके प्रस्तावका जो आपने प्रश्न किया है, हम उसपर चर्चा कर रहे थे कि किस प्रकारसे क्षेत्रीय दल एक होकर मतदानमें भाजपाका सामना करेंगी । विपक्षके एकजुट होनेका प्रयास तब तक सफल नहीं होगा, जब तक कांग्रेस हमारी आशाओंके अनुसार भाजपासे लडनेके लिए सज्ज नहीं हो जाती । विपक्षकी एकतापर चर्चा की जा रही है, आपने देखा होगा कि सोनिया गांधीद्वारा विपक्षी दलोंको एकजुट करनेके लिए बहुत से प्रयास किए जा चुके हैं । जैसा कि हम मतदानके निकट आ रहे हैं तो मुझे विश्वास है कि बडा निर्णय अवश्य लिया जाएगा ।’

स्रोत : जनसत्ता



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