वैदिक उपासनाके निर्माणाधीन आश्रमके सम्बन्धमें एक व्यक्तिसे मेरी चर्चा हो रही थी तो उन्होंने कहा कि आपको आश्रमके निर्माण कार्यके लिए धन चाहिए तो आप अपनी ब्रांडिंग कराएं, आपको हिंदी-इंग्लिश अच्छी आती है, डिजाइनर वस्त्र पहनें, बडे मंचसे प्रवचन आयोजित कराएं, भव्य संगीत एवं भजनके आयोजन कराएं, सिने कलाकार एवं अपने क्षेत्रके सुप्रसिद्ध व्यक्तियोंको बुलायें, इससे देखिएगा, लोग आपकी ओर आकर्षित होंगे और आपके कार्यको धन मिलेगा और यह सब कोई ब्रांडिंग करनेवाली कंपनी, जो आज अन्य धर्मगुरुओंका ब्रांडिंग करती हैं, वे कर देंगी !
मैंने कहा, भैया, मेरी ब्रांडिंग तो उसी दिन हो गई जिस दिन मैं अपना सर्वस्व छोडकर अपने श्रीगुरुके शरणागत हुई ! मेरी ब्रांडिंग एक शिष्यके रूपमें ईश्वरने कर दी है, ब्रांडमें समस्या हो तो बार-बार ब्रांडिंगकी आवश्यकता होती है ! मेरा ब्रांड पुरातन है (गुरु-शिष्यकी परम्परा सनातनकी ब्रांड है) और वह अपने आपमें सर्वोपरि है और आश्रम बनना ही चाहिए, यह मेरा आग्रह या इच्छा थोडे ही है, ईश्वरकी इच्छा थी तो यहां तक हो गया, आगे उनकी इच्छा होगी तो आगे भी होगा अन्यथा मुझे क्या, जहां है वहीं छोड दूंगी ! माया त्यागकर पुनः मायाका आलिंगन नहीं कर सकती, यह मेरी प्रवृत्ति नहीं ! – तनुजा ठाकुर
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