उपासना आश्रममें सात्विक पक्षियोंके सकारात्मक प्रत्युत्तर!
आज प्रातः आश्रममें टहलने निकली तो हमारा प्रिय नीलकंठ मुझे वहां दिखाई दिया जहां वह कभी बैठता नहीं है ! पतझडके कारण उस वृक्षपर एक भी पत्ते नहीं थे इसलिए मेरा उसपर सहज ध्यान चला गया ! पिछले पंद्रह दिवससे वह दिखाई नहीं दे रहा था ! मैंने उससे सहज भावसे पूछा, “इतने दिन कहां थे ? कहीं दिखाई नहीं दिए !” आपको पूर्वके लेखोंमें बताया ही था कि एक नीलकंठका जोडा या एकाकी नीलकंठ आश्रममें प्रायः दिखाई देता है ! मैंने उससे जैसे ही पूछा, कुछ क्षण रुककर वह वहां ३०० मीटर दूर एक वृक्षकी ओर उड गया | मैं कुछ और वस्तुका निरिक्षण करने लगी | दो-तीन मिनिटके पश्चात देखा कि वह पुनः वहीं आकर बैठ गया ! मैं समझ गई वह बता रहा था कि वह अपनी गृहस्थी उस वृक्षमें बसानेमें व्यस्त था ! उसके पश्चात वह बहुत देरतक वहीं बैठा रहा !
इसीप्रकार एक पक्षी होता है जो मिट्टीका घोसला बनाता है, उसे भी बुत शुभ पक्षी माना जाता है, उसे अंग्रेजीमें बार्न बर्ड और हिंदीमें खलिहानी पक्षी भी कहते हैं, वे हमारे आश्रममें नवनिर्मित मीरा कुटीर भवनके आस-पास मंडराने लगी ! अभी मीरा कुटीरके बाहरका प्लास्टर नहीं हुआ है, मैंने उनसे कहा अभी यहां अपनी गृहस्थी मत बसाओ, थोडे समय पश्चात जब प्लास्टर हो जायेगा, फिर घोसला बना सकती हो ! तो कल मैंने देखा कि ध्यान कक्षके बरामदेमें जहां उसने एक वर्ष पूर्व घोसला बनाया था उसमें उन्होंने वे आना-जाना करने लगे हैं ! अर्थात अब वह वहीं अंडे देगी ! पक्षियोंके इस सकारात्मक प्रत्युत्तरसे बहुत आनंद हुआ ! अर्थात वे भी उपासनाके कुटुंब समान हमारी बात समझने लगे हैं ! – (पू.) तनुजा ठाकुर
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