एक साधकने पूछा है, “आपके गुरु तो सभीको कृष्णका नामजप करनेके लिए कहते हैं और कालानुसार आवश्यक भी है तो आप शिवको अपना आराध्य क्यों मानती हैं ?
जब हमने २०१० में उपासनाका कार्य आरम्भ किया, तब तक मैं श्रीकृष्णका ही जप करती थी, उपासनाकी स्थापनाके समय भी मैं श्रीकृष्णका ही जप करती थी, यहां तक कि भगवान श्रीकृष्णके आदेशपर ही उपासना नामक संस्थाकी स्थापना की । जब उपासनाकी स्थापना हो गई तो भगवान श्रीकृष्णने मार्च २०११ में कहा कि आपातकाल तक उपासनाका कार्य शिव तत्त्वके माध्यमसे होगा; अतः उनका ही नामजप और साधना करो; अतः भगवान श्रीकृष्णकी आज्ञा अनुसार मैंने शिवको अपना आराध्य माना है, बाल्यकालसे ही निर्गुणी उपासक रही हूं, मेरे लिए कृष्ण और शिव दोनों ही एक ईश्वरके दो रूप हैं; इसलिए मुझे शिव और कृष्णकी साधनामें कोई भेद नहीं लगता ! मैं तो ईश्वरके हाथकी एक कठपुतली हूं, उनकी सेविका हूं, वे जैसा आदेश देते हैं, उसे शिरोधार्यकर उनका कार्य करती हूं । वस्तुत: मैंने अपने इस जन्ममें २०११ से पूर्व शिवकी कभी कोई विशिष्ट साधना की ही नहीं थी; किन्तु श्रीकृष्णकी आज्ञा थी; इसलिए उनकी साधना आरम्भ की और उन्होंने (शिवजीने) सदैव ही मेरा, उपासनाके साधकोंका और उपासनाके कार्यको दिशा प्रदानकर, जो कृपा बरसाई है, उसीके फलस्वरूप इतने अल्प कालमें उपासनाका कार्य इतना वृहद हुआ है !
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