‘उपासना’की एक और विदेशमें रहनेवाली साधिका हुई जीवनमुक्त !


उपासनाकी एक और विदेशमें रहनेवाली साधिका हुईं जीवनमुक्त, इसप्रकार ‘हमारी संस्था विश्वव्यापी होगी’, इस ईश्वरीय सन्देशकी होने लगी है प्रतीति !

जब मुझे मेरे श्रीगुरुने अप्रैल २००८ में घर जाकर साधना करनेकी आज्ञा दी तो एक प्रकारसे मैं अत्यधिक प्रसन्न थी; क्योंकि बाल्यकालसे मेरी वृत्ति अन्तर्मुखी है, समष्टि कार्य हेतु वृत्तिको बहिर्मुख करना ही पडता है और उस कालमें मुझमें एकान्तमें साधना करनेकी इच्छा अत्यधिक प्रबल थी, मेरे पितातुल्य ब्रह्मवेत्ता श्रीगुरुने सदैव ही मेरी इच्छाको जाना है ! मैं बाल्यकालसे ही हिमालय जैसे किसी सुरम्य प्राकृतिक स्थानपर एकान्तवास करना चाहती थी, यह इच्छा भी मेरे श्रीगुरुने यद्यपि अल्पकालके लिए ही सही, किन्तु पूर्ण की ! इसलिए गुरुसे यह निर्देश मिलनेपर यद्यपि उनके स्थूल सान्निध्यसे दूर होनेका दुःख था; किन्तु अब मात्र व्यष्टि साधना करनी है, यह सोचकर मन बहुत आनन्दी हो जाता था ! डेढ वर्षतक मैं झारखण्डके एक ग्राममें एकान्तमें रहकर व्यष्टि साधना की; किन्तु भगवानजीको मेरा यह आनन्द अधिक दिनोंतक नहीं भाया और वे मुझे समष्टि साधनाके लिए मई २००९ से अन्तःप्रेरणा देने लगे ! उनकी इच्छा अनुसार मैं ‘फेसबुक’पर थोडी बहुत समष्टि करती थी; किन्तु उनका निर्देश था, स्वतन्त्र रूपसे धर्म कार्य हेतु न्यास (ट्रस्ट) बनाकर कार्य करनेकी और मैं व्यष्टि साधनाके आनन्दमें मग्न थी, ऐसेमें मुझे समष्टि साधना करना और वह भी साधकत्वहीन उत्तर भारतमें अर्थात अपना सिर उखलमें डालने समान था और इस तथ्यकी मैं प्रतीति गत आठ वर्षोंसे ले रही हूं ! इसलिए मैं उनका सन्देश एवं मनुहारको टालती रही, तभी दो ज्योतिषियोंने मुझसे ‘फेसबुक’के माध्यमसे जन्मतिथि लेकर मेरी थोडी भविष्यवाणी कर डाली और जब उनके आग्रहपर मैंने उन्हें अपनी कुण्डली देखने हेतु सर्व जानकारी दी (वैसे इस घटनासे पूर्व कभी भी ज्योतिषी या ज्योतिष विद्यामें मेरी रुचि नहीं थी, इन्हें भी मात्र इनकी भविष्यवाणीकी सत्यताका शोध करने हेतु उन्हें जो जानकारी चाहिए थी, वह दी थी) तो दोनोंने कहा, “आपकेद्वारा एक न्यासका (ट्रस्टका) निर्माण होनेवाला है और उसके माध्यमसे विश्वके अनेक लोग साधनाकर मोक्षकी ओर अग्रसर होंगे !” उन्होंने जो लिखा था, वह मात्र भगवानजीके सन्देशोंकी पुनरावृत्ति (दुहराव) मात्र थी, मैं इसे भगवानजीकी लीला मानकर मन ही मन मुस्कुराती और उनके भी आग्रहको टालती रही ! बाघके मुखमें खून लग जाए तो वह अपने ग्रासको कहीं छोडता है क्या ? मेरी स्थिति भी वैसे ही थी ! व्यष्टि साधनामें इतनी डूब चुकी थी कि समष्टि साधनाकी इच्छा ही नहीं हो रही थी और सब छोडकर साधनाकी ओर प्रवृत्त हुई थी, पुनः इसी प्रपंचमें पडना मुझे स्वीकार्य नहीं था ! मैं जान रही थी कि इन ज्योतिषियोंके माध्यमसे ईश्वर ही बोल रहे हैं और अब मेरा बचना कठिन है ! एक ज्योतिषीको तो मुझमें कोई रुचि नहीं थी, वे मात्र आध्यात्मिक व्यक्तिकी कुण्डलीके शोधमें इच्छुक थे ! दूसरे ज्योतिषी जीवनमुक्त साधक हैं और आपको ज्ञात है कि मात्र मुझे समष्टिमें लानेके कारण ईश्वरने उन्हें जीवनमुक्त कर दिया ! जब एक दिवस भगवानजीने कहा, “यूगांडाके तुम्हारे ज्योतिष-साधक, श्री भारत पाण्ड्या जीवनमुक्त हो गए” तो मैंने उनसे मुस्कुराते हुए पूछा, “वे कुछ साधना कहां करते हैं ?, तो आपने उन्हें जीवनमुक्त कैसे कर दिया ?” तो वे बोले, “तुम्हें पुनः समष्टिमें लाया उसने ! यह कम बडी बात है क्या ?, मेरे सूक्ष्म सन्देश और सब मनुहारको तुम ठुकराती रही; (मनुहार इसलिए कि वे मुझे भिन्न प्रकारके उदाहरण, जो आज सत्य हो रहे हैं, उसे बताकर मनानेमें लगे थे) इसलिए मुझे उसे माध्यम बनाना पडा और उसने अपना कार्य उत्कृष्टतासे किया तो उसे जीवनमुक्त तो होना ही था !’’ मैं हंस पडी ! ये जो ज्योतिषी महोदय हैं, वे जैसे मेरे पीछे ही पड गए और मुझसे ‘उपासना’की स्थापना करवाकर ही थमे ! जब वे बार-बार मुझे न्यासकी (ट्रस्टकी) स्थापना करने हेतु कहते रहते तो एक दिवस मैंने उनसे कहा, “आप क्यों मुझे समष्टिमें ढकेलना चाहते हैं ? तो उन्होंने कहा कि उनकी कुण्डलीमें लिखा है कि मेरे माध्यमसे ही उनका कल्याण है और मैं यदि यह करती हूं तो ईश्वर उनसे प्रसन्न हो जाएंगे ! मैंने उनसे कहा, “मुझे पुनः इस प्रपंचमें नहीं फंसना, दो रोटी खाकर ईश्वरीय चिंतनमें मग्न रहना चाहती हूं, आप यह छोटीसी बात क्यों नहीं समझते हैं ?” उन्होंने कहा, “किन्तु विश्वके अनेक साधक जो आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, उनका क्या ?” यह भी बात ईश्वर मुझे कई बार बता चुके थे ! अन्तत: भगवानजी विजयी हुए और मैं पराजित हुई, वैसे भी उनसे कौन जीत पाया है ?! और मेरी शान्ति इस प्रपंचमें भंग हो गई ! बस मात्र जब ‘उपासना’के कुछ साधकोंको अध्यात्ममें प्रगति करते देखती हूं तो मनको थोडी शान्ति मिलती है !

 वर्ष २०१० से आरम्भ हुई ‘उपासना’के संक्षिप्त कार्यकालमें जीवनमुक्त हुए साधकोंमें पांच जीवनमुक्त साधक (६१ % आध्यात्मिक स्तरको प्राप्त हुए साधक) विदेशसे हैं ! कल ही कनाडाकी एक साधिका जीवनमुक्त हो गईं !

इन सब प्रसंगोंसे कुछ तथ्य उभरकर आए, जो इसप्रकार हैं –

१. प्रत्येक व्यक्तिको क्या करना है ?, यह उसके जन्मसे पूर्व ही निर्धारित हो जाता है ! नियतिके आगे सभी विवश होते हैं !

२. ज्योतिषशास्त्र एक पूर्ण वैज्ञानिक प्रगत शास्त्र है ।

३. ईश्वरेच्छाके आगे सभीको नतमस्तक होना ही पडता है ।

४. व्यष्टि साधनासे अधिक प्रिय, ईश्वरको समष्टि साधना है !



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