उपासनाके आश्रम हेतु जब हम प्रथम बार भूमिपर आए तो वास्तु तो सात्त्विक थी ही साथ ही ईशान कोणमें एक कुंआ बना हुआ था | उसमें जल भी था और वह कृषिकी सिंचाई हेतु बनायीं गई होगी इसलिए उसका व्यास २५ फीट के लगभग है | उसे देखकर भी मेरा मन प्रसन्न हुआ | ईशान कोणमें जलका स्रोत होना वास्तु शास्त्र अनुसार शुभ होता है ! उस समय हमें पता नहीं चला पाया कि वह कितना गहरा है; किन्तु एक तो पूर्वमुखी भूमि, चारों और पवित्र विन्ध्याचलकी पर्वत शृंखला, उसपर ऋषि जमदग्निकी सत्ययुग कालीन तपोस्थली, उस स्थानकी सात्त्विकताको और भी बढा रही थी ! मुझे आस-पास शान्ति चाहिए थी, वह भी है ! यद्यपि भूमिसे ३०० मीटरपर मुंबई-आगरा राजमार्ग है; किन्तु २०२५ तकके महाविनाशके पश्चात वाहनोंकी संख्यामें बैल गाडी, घोडागाडी, कुछ जल, सूर्यप्रकाश एवं बिजलीसे चलनेवाले अत्यधिक सीमित संख्यामें वाहन होंगे, यह सब सोचकर मैंने उस भूमि हेतु हामी भर दी ! अर्थात उपासनाके मुख्यालय हेतु मुझे जैसी भूमि चाहिए थी वह पूर्णत: वैसी ही थी !
– (पू.) तनुजा ठाकुर, संस्थापिका, वैदिक उपासना पीठ
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