उपासनाकी गोशालाके सम्बन्धमें कुछ अनुभूतियां !


इस माहके मासिक पत्रिकामें हमें आपको यह बताया ही था कि उपासनाकी गोशालामें गोलोकसे एक उच्च कोटिके जीवका बछडीके रूपमें जन्म हुआ है । इस सम्बन्धमें आपको कुछ अनुभूतियां भी बताई थीं । आज इसी सम्बन्धमें एक साधकको अनुभूति हुई है । यहां मानपुरमें एक सन्त जिनका देहत्याग हो चुका है, उनके साधक हैं जो उपासनाके शुभचिन्तक हैं । वे शासकीय अधिकारी हैं और अभी गृहबन्दीके मध्य अपने घर न जाकर यहीं मानपुरमें कहीं निवासकर अपना कार्यकर रहे हैं । हमारी बछियाके जन्मके दस दिवस पश्चात आए थे । हमने उन्हें दूधसे बना हुआ कोई मिष्टान्न खानेके लिए दिया वह उन्हें बहुत ही दिव्य लगा । मैंने उनसे कहा “आप अभी जबतक मानपुरमें हैं तो हमारी गैयाका दूध ले जाएं, हमने सोच लिया है कि हमें दूधका विक्रय नहीं करना है, जो भी साधक आश्रममें हैं, वे इसका दूध, दही, मट्ठा, घी इत्यादिका सेवन करेंगे एवं आगुन्तक भी इसका सेवन कर सकते हैं । उन्हें देशी गायके दूधका महत्त्व ज्ञात है; इसलिए उन्होंने झटसे हामी भरी और कहा कि  प्रतिदिन तो नहीं आ पाऊंगा; किन्तु दो चार दिनमें ले जाया करूंगा । हमने उन्हें प्रथम दिवस जब दूध दिया तो वे अगले दिवस आ गए और कहने लगे इस गायका दूध पीकर तो मेरा सत्त्व गुण जैसे बढ गया, आज मलावरोध (कब्ज) भी नहीं हुआ और साधनामें मन भी एकाग्र हुआ । अब तो मैं प्रतिदिन दूध लेने आऊंगा ! वस्तुत: यह उस बछडीद्वारा मांके थनको स्पर्श करनेसे कारण ही होता है कि दूधकी सात्त्विकता और भी बढ जाती है । वो कहते हैं न ‘प्रत्यक्षं किम प्रमाणं’ ! भविष्यमें उपासनाके आश्रममें बहुतसे वैदिक अनुष्ठान होंगे; इसलिए गोलोकसे गोमाताका आगमन होने लगा है, वैसे ही जैसे हिन्दू राष्ट्रको चलाने हेतु उच्च लोकोंसे उच्च कोटिके साधक जीवोंका जन्म होने लगा है । श्रीगुरुके इस विशेष कृपा हेतु हम उनके कृतज्ञ हैं, वे हमें इतना दे रहे हैं कि हमने उसकी कल्पना ही नहीं की थी ! मैं तो मात्र प्रेमसे निष्काम भावसे व प्रेमसे उपासनाके गोवंशकी सेवा करवा रही थी, इस बातका मुझे भान ही नहीं था कि मेरी इस सेवाका परिणाम इस अलौकिक रूपमें मुझे प्राप्त होगा !
     हमारी गोशालामें एक गैया है । जब मैं उसके पास जाकर नामजप करते हुए सहलाती हूं तो वह भी ध्यानमें जाने लगती है । उसका भी गोलोकसे आगमन हुआ है, उसका नाम चन्दा है । यह सब अनुभव करने हेतु आपको साधना करनी होगी एवं उपासनाके आश्रममें आकर गोमाताकी सेवा करनी होगी । ईश्वर या गोमाता अनुभूति मात्र सुपात्रको ही देते हैं । – (पू.) तनुजा ठाकुर


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