कुछ व्यक्तिका कहना है कि आपकी अधिकतर बातें अच्छी लगती हैं, मात्र जब आप हिन्दु धर्ममें हो रही ग्लानिको रोकनेके लिए कठोर शब्दोंका प्रयोग करती हैं तो वह हमें अच्छा नहीं लगता और आश्चर्यकी बात यह है कि ऐसे टीका करनेवाले अधिकतर आध्यात्मिक प्रवृतिके होते हैं तो ऐसे भक्तोंको एक बात बता दूं धर्मकी पुनर्स्थापनाके लिए धर्मद्रोहियोंका (आसुरी प्रवृत्तिवालेका) विरोध करना और समय आनेपर उन्हें दण्डित करना अति आवश्यक होता है !
जब कोई व्यक्ति कर्करोगसे पीडित हो जाता है तो यह थोडे ही सोचते हैं कि शरीरके भीतर विद्यमान बेचारा कर्करोगका विषाणु मर जायेगा; अतः औषधि नहीं लूंगा, वह पहले अपने प्राण बचाने हेतु औषधि लेकर उस विषाणुका नाश करता है; क्योंकि वह उसके जीवित रहने हेतु आवश्यक हो जाता हैं और बडेसे बडे अहिंसावादी रोगग्रस्त होनेपर भी वैद्यसे औषधि लेकर विषाणुका नाश करते हैं । मच्छर काट रहा हो तो मच्छरको यह थोडे ही कहते हैं “और खून चूसो तुम्हारा पेट भरे तो मुझे आनंद आएगा,” अपितु वहांपर उस मच्छरको नष्ट कैसे करें, यह सोच कर उसे मारते हैं; क्योंकि ऐसा करनेसे हम मच्छरसे अपना रक्षण करते हैं । जब अर्जुन ने भगवान श्री कृष्णसे कहा कि युद्धमें मेरे शत्रुपक्षमें सब मेरे सगे हैं; अतः युद्ध नहीं करूंगा तब भगवानने ऐसा थोडे ही कहा “तुमने सत्य ही कहा है, अहिंसा ही धर्म है; अतः चलो युद्ध छोडकर चलें, ” इसके विपरीत गीताके माध्यमसे उन्होंने कहा कि उसके लिए युद्ध करना उसके धर्म पालनका अंग हैं ! उसी प्रकार कालानुसार धर्मकी सर्वत्र ग्लानि हो रही है ऐसेमें क्षात्रवृत्तिके साथ उसका यथोचित कृति करना, यह काल अनुसार सभी भक्तोंका धर्म है यह ध्यान रखें – तनुजा ठाकुर
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