शत्रु राष्ट्र पकिस्तानद्वारा प्रायोजित आतंकवादको रोकने हेतु उसके विरुद्ध शीघ्र त्वरित कठोर कार्यवाही करना है अति आवश्यक


चाणक्य सूत्रमें बताया गया हैअनन्तर प्रकृति: शत्रु:’ अर्थात् पडोसी राष्ट्र, प्रकृति-शत्रु यानीस्वाभाविक शत्रु माना जाता है; किन्तु इस देशके राज्यकर्ता इस सत्यसे मुख फेरकर बैठे हैं । पाकिस्तान पुरस्कृत आतंकवादके कारण सम्पूर्ण भारतमें अनेक घटनाओंद्वारा स्पष्ट साक्ष्य मिलनेके साथ ही दिन-प्रति-दिन कश्मीरकी स्थिति भयावह होती जा रही है, जो सम्पूर्ण राष्ट्रकी एकता एवं अखण्डताके लिए चिन्ताका विषय है । कश्मीरमें नित्य प्रतिदिन आतंकवादी घटनाओंका होना, अधिक संख्यामें आतंकवादियोंका पाकिस्तानसे घुसपैठ करना, एक रणनीति अन्तर्गत पाकिस्तानके आतंकवादियोंद्वारा स्थानीय लोगोंको सेनाके विरुद्ध कर, गृहयुद्ध समान स्थिति उत्पन्न करना, ख्रिस्ताब्द २०१५ की अपेक्षा अधिक संख्यामें सुरक्षाबलोंका आतंकवादी आघातोंमें चोटिल होना या मृत्यु होना, कश्मीरके राजनेताओंद्वारा पृथकवादी घटनाओंका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूपसे बार-बार सराहना करना एवं  वहां कार्यरत सेनाके मनोबलको गिराना, सेनाके सत्प्रयासोंकी निन्दा करना या दोषारोपण करना, ये सर्व घटनाएं चीख-चीख कर कह रही हैं कि भारतको अपनी पडोसी राष्ट्रके साथ विशेषकर पाकिस्तान के साथ पर-राष्ट्रनीतिपर पुनर्विचार करनेकी आवश्यकता है । भारत, पाकिस्तानके बढते हुए दुस्साहसका मुंहतोड उत्तर देनेकी अपेक्षा  मात्र द्विपक्षीय वार्ताको स्थगित करता है एवं अमरीका मध्यस्तता करे, इस  हेतु कातर दृष्टिसे देखता है । अमरीका तो सदैव, सर्वप्रथम अपने हितकी सोचता है एवं जिससे उसकी स्वार्थसिद्धि हो, वह, वही निर्णय लेता है । कुलभूषण जाधवके मृत्युदण्डके विषयमें अमरीकाकी तटस्थ भूमिकासे इस तथ्यकी पुनः पुष्टि हो जाती है ।
ऐसी स्थितिमें क्या भारत सामरिक या राजीनीतिक दृष्टिसे स्वयं निर्णय लेकर शत्रु राष्ट्र पाकिस्तानको दण्डित करनेमें सक्षम नहीं, यह प्रश्न अब इस देशके लोगोंमें निर्माण होने लगा है ।
पर-राष्ट्रनीतिका विवेचन करते हुए आचार्य शुक्राचार्य शुक्रनीतिमें बताते हैं कि आवश्यकता पडनेपर दण्डनीतिका प्रयोग भी मित्र व शत्रु दोनों राष्ट्रोंके विरुद्ध किया जा सकता हैं । मित्र-राष्ट्रको  यह  चेतावनी देना कि वह यदि मनमाना व्यवहार करेगा तो हम मित्र नहीं रहेंगे, यह दण्ड नीति है । जबकि शत्रु-राष्ट्रके दोष प्रकट करना, धन नष्ट करना, युद्धमें कष्ट देना उसके प्रति दण्ड नीति है ।
यह सत्य है कि युद्ध कर, किसीको दण्डित करना, यह अन्तिम दण्डनीति होती है; किन्तु क्या पाकिस्तानने  और कोई पर्याय भारतके लिए छोड रखा है ?
यदि किसी अंगमें नाडी-व्रण (नासूर ) हो जाए तो उसका उपाय शीघ्र करना आवश्यक होता है अन्यथा  वह सम्पूर्ण देहके लिए घातक बन जाता है, उसीप्रकार जबसे पाकिस्तानका जन्म हुआ है तबसे वह भारतके लिए एक नाडी-व्रण  बनकर  कष्ट देता रहा है । इस नाडी-व्रणको दूर करने हेतु एक सर्जिकल स्ट्राइकका होना पर्याप्त नहीं है; अपितु उसके घर घुसकर आतंकवाद रुपी नाडी -व्रणको जडसे समूल नष्ट करनेकी आवश्यकता है । यदि अमरीका ईसिसके आतंकवादियोंके ठिकानोंको नष्ट करने हेतु अफगानिस्तानमें घुसकर महाबमका उपयोग कर सकता है तो भारत, पाकिस्तानके आंतकवादी ठिकानोंपर आक्रमण क्यों नहीं कर सकता ?
जिसप्रकार भारतद्वारा की गयी सर्जिकल स्ट्राइककी सम्पूर्ण विश्वने सराहना की, उसीप्रकार भारत, पाकिस्तानको दण्डित करनेका निर्णय तो ले, साम्प्रत कालमें इस विश्वमें कोई देश नहीं जो मात्र इस कारणसे भारतसे अपना सम्बन्ध तोडकर ऐसे विशाल उपभोक्ता बाजारको छोडनेकी चूक करेगा । भारतको एक ऐतिहासिक निर्णय लेकर साहसिक पग उठानेका समय आ गया है, वस्तुत: अभी नहीं तो कभी नहीं, यह सोचकर अब और देर नहीं करनी चाहिए और सभी भारतीय, पाकिस्तानके कुटिल  चालोंसे भली-भान्ति परिचित है; अतः पाकिस्तानको समुचित दण्ड मिले, यह सभी भारतीयोंकी  इच्छा है ।  तनुजा ठाकुर



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