उत्तिष्ठ कौन्तेय !


गुजरातके शाह कुटुम्बने सहर्ष होने दिया अपने प्रतिभाशाली पुत्रको धर्मके मार्गमें उन्मुख
गुजरातके वर्शील शाहने गुजरात बोर्डके १२वींकी परीक्षामें ९९.९ प्रतिशत अंक पानेके पश्चात् जैन संन्यासी बननेका निर्णय लिया और उसमें उनके माता-पिताकी सहर्ष सहमति है और वे उनके संन्यास धारण करनेके उत्सवमें उपस्थित भी थे । वहीं यदि कोई हिन्दू कुटुम्बमें कोई युवा धर्म हेतु अपना सर्वस्व अर्पण करनेका निर्णय लेता है तो घरके सभी सदस्य उसका विरोध कर, उसे हतोत्साहित करते हैं । हिन्दुओ ! शाह कुटुम्बसे सीखें कि धर्मके लिए यदि आपकी कोई सन्तान अपना सर्वस्व अर्पण करना चाहें तो उसके निर्णयका स्वागत कैसे करना चाहिए ? वस्तुत: आज चिकित्सक और अभियन्ताको तो गली-गलीके माता-पिता जन्म देते हैं; किन्तु ऐसे कुलदीपकको जन्म देना, जो धर्मके पथपर चलने हेतु अपना सर्वस्व अर्पण कर सके एवं अपना, अपने कुलका तथा समाजका उद्धार कर सके, वह विरला ही होता है और विशेषकर आजके अधिकांश हिन्दू माता-पिता तो इतने स्वार्थी हो गए हैं कि वे मात्र अपनी वृद्धावस्थाको सुरक्षित करने हेतु अपने बच्चेको जन्म देते हैं, उन्हें धन अर्जित करना सीखाते हैं और धर्म एवं अध्यात्मसे अपनी सन्तानोंको कोसों दूर रखते हैं; परिणाम यह होता है कि ऐसी स्वार्थी, धर्मविरहित भोगमें लिप्त सन्तानें, वृद्धावस्थामें अपनी माता-पिताको वृद्धाश्रम छोड आती हैं या घरमें उनकी उपेक्षा करती हैं । अब बबूल बोएंगे तो आमका फल, उस वृक्षसे कैसे मिलेगा ? (९.६.२०१७)



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