देवता और सामान्य विकारयुक्त मनुष्यमें भेद न समझनेवाले विवेकहीन हिन्दू करने लगे हैं, राजनेताओंकी पूजा और आरती !
राजनेताओंको देवता समान पूजनेवाली महामारी, जो दक्षिण भारतसे आरम्भ हुई थी, उसका प्रचलन अब उत्तर प्रदेशमें सत्तारूढ भाजपाके सहयोगी दल ‘सुभासपा’का नाम भी जुड गया है । सुखपुरा थाना क्षेत्र स्थित राजभर बिरादरी बहुलवाले धर्मपुरा गांवमें सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टीके (सुभासपा) अध्यक्ष तथा प्रदेशके दिव्यांग जन सशक्तिकरण मन्त्री ओम प्रकाश राजभरका छायाचित्र उनके लगभग प्रत्येक समर्थकके घरमें टंगा हुई है । वे धर्मपुरा गांव स्थित काली मन्दिरमें सप्ताहमें एक दिन जुटते हैं और मन्दिरके द्वारपर राजभरकी प्रतिमा रखकर उसकी विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं ! राजभर समर्थक पूजनके साथ कामना करते हैं कि उनके नेता प्रदेशके मुख्यमन्त्री बनें !
आश्चर्यकी बात यह है कि इसमें स्वयं ओमप्रकाश राजभरको कुछ भी अनुचित नहीं लगता है ! राजभरका कहना है वह भगवान शिवके उपासक हैं, उन्होंने निर्धनोंके लिये संघर्ष किया है । निर्धनोंके दृष्टिमें जो दाता होता है, वही उनके लिए भगवान बन जाता है । प्रतिदिन राजभरकी प्रतिमाकी आरती उतारनेवाली सुगरी देवी कहती हैं कि वह गरीबोंके दूत (मसीहा) और दुखहर्ता हैं; इसलिए वह उनको भगवान मानती हैं ।
इसी स्थितिको ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ कहते हैं !
देवताकी पूजा और आरती करनेसे हमें दिव्यता प्राप्त होती है, हमारी आध्यात्मिक प्रगति होती है, जब तक यह सृष्टि है, तब तक देवताका अस्तित्व होता है, वे ईश्वर निर्देशित, सृष्टिके विभागीय संचालक होते हैं; इसलिए उनकी पूजा की जाती है ! सामान्य मनुष्यका देवता समान पूजन व आरती करना और करवाना दोनों ही पाप है ! इससे जिसकी पूजा होती है, उसमें अहंकारकी वृद्धि होनेसे उसकी आध्यात्मिक अधोगति हो सकती है, मृत्यु उपरान्त उसकी यात्रा बाधित हो सकती है, विकारयुक्त मनुष्यकी पूजा करनेवाले भी मृत्यु उपरान्त अटक जाते हैं ! यह सब हिन्दुओंको धर्म शिक्षण न मिलनेका ही परिणाम है और कुछ नहीं ! देवता कौन होते हैं, उनकी विशेषताएं क्या है, वे क्यों पूज्य होते हैं, उनकी अलौकिकतासे मनुष्यको क्या लाभ हो सकता है ?, यह सब ज्ञात न होनेके कारण ही यह अधर्म हो रहा है !; इसलिए हिन्दू राष्ट्रमें धर्मके सभी विषयोंपर बाल्यकालके पाठ्यक्रमोंसे ही ज्ञान दिया जाएगा ! – तनुजा ठाकुर (८.८.२०१८)
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