उत्तिष्ठ कौन्तेय !


राजस्थानमें संस्कृत विद्यालयकी दुर्दशा, केवल तीन कक्षोंमें पढते हैं ५०० बच्चे
संस्कृत शिक्षाको बढावा देनेके क्रममें, शासनने स्थान-स्थानपर विद्यालय भी खोले हैं । इसके पश्चात भी संस्कृत विद्यालयोंकी स्थिति आज भी ठीक नहीं है । संस्कृत विद्यालयोंमें पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं तो कक्षाओंकी अल्पता भी बनी हुई है । बच्चोंकी संख्याके अनुसार विद्यालयोंमें कक्ष नहीं होनेसे बच्चोंको कभी बरामदोंमें, तो कभी खुलेमें बैठकर अपने भविष्यकी शिक्षा लेनी पड रही है ! इसके पश्चात भी शिक्षा विभाग कोई पग नहीं उठा रहा !
   कोटा जनपदके चेचट उपमण्डलमें संचालित संस्कृत विद्यालयोंमें साढे पांच सौसे अधिक बच्चे नामांकित हैं; परन्तु इस विद्यालयमें केवल चार कक्ष हैं ! इसमें भी एक कक्षका उपयोग शिक्षक अपने विभागीय कार्योंमें करते हैं । ऐसेमें बच्चोंकी शिक्षा केवल तीन कक्षोंमें हो रही है । कक्ष नहीं होनेसे अधिकांश समय एक कक्षमें दो सौसे अधिक बच्चोंकी शिक्षा होती है ! भरे हुए कक्षोंमें बच्चे कैसे पढते होंगें ?, इसका अनुमान सरलतापूर्वक लगाया जा सकता है । अन्य बच्चोंको बरामदोंमें बैठकर शिक्षा लेनी पडती है ! कई बार तो बच्चोंको कक्षासे बाहर खुलेमें भूमिपर भी बैठना पडता है ।
 शिक्षकोंको भी कठिनाई हो रही है । शीत ऋतुमें तो बच्चोंको बाहर खुलेमें बैठाकर पढाई करवा लेते हैं; किन्तु गर्मी और वर्षामें साढे पांच सौसे अधिक बच्चोंको तीन कक्षोंमें बैठाकर अध्ययन करवाना शिक्षकोंके लिए अत्यधिक कठिन सिद्ध होता है । इस स्थितिमें एकसे अधिक कक्षाओंके बच्चोंको एक साथ बैठाकर अध्ययन करवाया जाता है, जिससे उन्हें अच्छी प्रकारसे शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है । ऐसा नहीं है कि शिक्षकोंने समस्या कभी विभागको नहीं बताई, दशकाधिक बार परिवाद (शिकायत) भेजी; किन्तु प्रत्येक बार कुछ भी न हुआ !
“शिक्षामें कोट्यावधि रूपये शासन प्रत्येक वर्ष व्यय करता है, तब भी शिक्षाकी, विशेषतया संस्कृतकी, ऐसी स्थिति अवश्य विचारणीय है । शिक्षामें ऐसी अनदेखी अक्षम्य है और जो विद्यालय संस्कृतका पोषण कर रहे हैं, उनकी ऐसी विडम्बना तो महापाप है; क्योंकि संस्कृत ऐसे ही लुप्तप्राय होनेकी सीमापर है । जिन शासकीय अधिकारियोंको इन कार्योंके लिए नियुक्त किया गया है, क्या वे दण्डके पात्र नहीं ? शासन त्वरित इसपर उचित कार्यवाही करें, यह सभी राष्ट्रवादियोंकी मांग है ! – तनुजा ठाकुर



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