वाङ्मयीन तपके अभावमें आजके हिन्दुओंमें व्याप्त हुई बुद्धिभ्रष्टता


वाङ्मयीन तप रूपी इस विशिष्ट अलंकारको धारण करनेके अभावमें आजके हिन्दुओंमें व्याप्त हुई है बुद्धिभ्रष्टता 
निधर्मी शिक्षण पद्धति मात्र और मात्र धन अर्जित करना सिखाती है; परिणामस्वरूप सम्पूर्ण जीवन मनुष्यका लक्ष्य इसीपर केन्द्रित रहता है । प्रथम विद्यार्थी जीवनमें कैसे अधिकसे अधिक धन अर्जित किया जा सके ?, मात्र उस हेतु शिक्षा ग्रहण करना, उसके पश्चात गृहस्थ जीवनमें अपने बच्चोंको अधिकसे अधिक धन अर्जित करवाने हेतु अपना सर्वस्व (धन, समय और कौशल्य) उसमें अर्पण करना और सेवानिवृत्तिके पश्चात भी मात्र अपनी सन्तानोंके सुखमें या दुःखमें समय व्यतीत कर देना ! धर्म और साधनाके लिए आजके लोगोंके पास समय नहीं होता है, जिसका मुख्य कारण है शास्त्रोंका अभ्यास न करना ! शास्त्रोंके अभ्याससे साधनाको गति मिलती है, बुद्धि सात्त्विक होकर विवेकमें परिवर्तित होती है एवं उचित-अनुचित और सत्त्व, रज और तम, इनमें भेद करनेमें सहायता मिलती है ! मन, वचन और कर्म सब ईश्वरप्रेरित होनेसे जीवद्वारा पापकर्म भी अधिक नहीं होते हैं ! , इसलिए यह ‘वाङ्मयीन तप’ सभी बुद्धिजीवी मनुष्योंके लिए आवश्यक कर्म है !
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङमयं तप उच्यते ॥
अर्थ : उद्वेगको जन्म न देनेवाले, यथार्थ, प्रिय और हितकारक वचन (बोलना), (शास्त्रोंका) स्वाध्याय और अभ्यास करना, यह वाङ्मयीन तप है ।


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