हमारी वैदिक संस्कृतिमें गृहस्थ भोजन करनेसे पूर्व अपने गृहके बाहर खडे होकर अथितिकी राह देखते हैं, यदि कोई आ जाए तो उसे भोजन आदिसे तृप्तकर, तब भोजन करते थे; परंतु आज यदि भोजनके समय कोई अतिथि आ जाए तो उनके सामने झूठी मुस्कानके साथ उनके भूखे जानेकी ईश्वरसे प्रार्थनाकर, प्रतीक्षा करते हैं | वाह ! देखिये आज हम कितने आधुनिक हो गए हैं !
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