वैदिक उपासना पीठका वानप्रस्थ प्रकल्पकी विशेषताएं (भाग-१)


उपासनाद्वारा शीघ्र आरम्भ होनेवाले वानप्रस्थ प्रकल्पमें सहभागी होकर अपने जीवनके उत्तरार्धको सार्थक करें ! इस प्रकल्पमें आपको क्यों सहभागी होना चाहिए ?, इसके विषयमें आपको ज्ञात हो एवं अन्य आश्रम भी ऐसे प्रकल्प आरम्भ करें, इस उद्देश्यसे यह लेखमाला आरम्भकर रही हूं ।
         वर्तमान कालमें अधिकांश गृहस्थ अपने सेवा निवृत्तिके कालसे पूर्व, साधना या तो ज्ञानके अभावके कारण नहीं कर पाते हैं या इच्छा होनेपर भी अपने उत्तरदायित्वके निर्वहनमें व्यस्त रहनेके कारण, अपनी साधनाको अधिक समय नहीं दे पाते हैं । साथ ही वर्तमान समयमें ‘हम दो हमारे दो’के कारण कुछ लोगोंको मात्र पुत्रियां ही सन्तानके रूपमें होनेके कारण व विवाहित पुत्रीके साथ कैसे रहेंगे ?, इस संकोचसे वे अपने भविष्यको लेकर चिन्तित रहते हैं तो कुछ लोगोंकी सन्तानें विदेश पढने जाती हैं और वे वहीं बस जाती हैं या वे गए तो भविष्यमें वहीं बस जाएंगे तो हमारा क्या होगा ?, ऐसी चिन्ता उन्हें घेरे रहती है । साथ ही आजकी आधुनिक शैलीमें रहनेवाले कुछ युवा व युवतियां, कुछ कारणवश अविवाहित रह जाते हैं, उन्हें भी अपने भविष्यकी चिन्ता होती है । वैसे ही आज सम्बन्ध विच्छेदके प्रकरण बढनेके कारण भी अनेक लोग अपने बच्चोंके विवाहके पश्चात एकाकी रहते हैं तो उन्हें भी अपने भविष्यकी चिन्ता रहती है ।  ऐसी सभी समस्याओंके एक उपाय स्वरूप हमारी संस्था वानप्रस्थ प्रकल्पका आरम्भ कर रही है ।
इस प्रकल्प अन्तर्गत इच्छुक व्यक्ति अपना पंजीकरण कराकर इसका लाभ उठा सकते हैं ।  इस प्रकल्प अन्तर्गत साधक वृत्तिके व्यक्ति अधिक जानकारी हेतु हमें ९७१७४९२५२३ इस सम्पर्क क्रमांकपर अपना सन्देश भेज सकते हैं ।
  अब आपको इस प्रकल्पकी कुछ विशेषताएं इस लेखमालाके माध्यमसे बताएंगे
१. इस प्रकल्पमें सहभागी होनेसे आश्रम व्यवस्थाकी भारतमें होगी पुनार्स्थापना
 यह प्रकल्प आश्रम परिसरमें होनेके कारण, जिज्ञासु व साधकोंको साधना हेतु योग्य मार्गदर्शन व वातावरण मिलेगा । वर्तमान कालमें वानप्रस्थ जीवनमें साधना हेतु जो पोषक वातावरण चाहिए होता है, वह घरमें नहीं मिलता है | अधिकांश वानप्रस्थी अपना अनमोल शेष बचा जीवन पोते-पोती पालनेमें व्यतीतकर देते हैं एवं जब वही पोते-पोती जब बडे हो जाते हैं तो उनके पास दादा-दादीके लिए समय नहीं होता है और पुत्र व पुत्रवधू यदि अच्छे हों तो उनके पास भी अपने माता-पिताके लिए समय नहीं होता, ऐसेमें उनके लिए समय व्यतीत करना कठिन हो जाता है । एकाकी रहनेसे उनमें उदासी या अवसाद हो जाता है । ऐसेमें वानप्रस्थ प्रकल्पमें उन्हें उनकी ही आयुके लोग मिलेंगे, जिनसे वे बातें कर सकते हैं एवं साथ ही आश्रम जीवनकी दिनचर्यामें उनकी क्षमता अनुरूप उनके पास सेवा होगी तो वे उसमें भी व्यस्त रहेंगे और इसकारण उन्हें आनन्द मिलेगा; क्योंकि कहीं न कहीं उन्हें यह लगेगा कि उनका जीवन सार्थक हो रहा है । आश्रममें स्थायी निवास होनेपर पुत्र-पुत्री सपरिवार उनसे मिलने आएंगे, इससे उनकी अगली पीढियोंको योग्य साधना, त्याग, धर्मपालन एवं सात्त्विक वातावरणका महत्त्व ज्ञात होगा । हमारे वानप्रस्थ प्रकल्प अनुसार वानप्रस्थीके पुत्र या पुत्रीके परिवार पन्द्रह दिवस निःशुल्क आश्रममें आकर आश्रम जीवनकी दिनचर्या कैसे होती है ?, गृहस्थ अपने घरमें रहकर धर्माचरण कैसे कर सकते हैं ?, योग्य साधना, इन सबके विषयमें मार्गदर्शन दिया जाएगा ।  इससे वे भी अपने गृहस्थ जीवनमें साधना व धर्मपालन कर पाएंगे, इससे उनका जीवन सुखी व आनन्दमय होगा, वे भी भी सेवा निवृत्त होनेपर वानप्रस्थ जीवनमें राष्ट्र व धर्म हेतु निष्काम भावसे सेवा हेतु उद्यत होंगे । इससे आश्रम व्यवस्थाकी (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास) पुनर्स्थापना होगी तथा समाज एक आदर्श वैदिक शैलीमें जीवन व्यतीत करने लगेगा । इसमें दो तीन पीढियां अवश्य जाएंगी; किन्तु हिन्दू धर्म और भारतका भविष्य उज्ज्वल होगा एवं इससे सम्पूर्ण संसारमें हिन्दू धर्मका स्वतः ही प्रसार होगा ।


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