वैदिक उपासना पीठके वानप्रस्थ प्रकल्पकी विशेषताएं (भाग-५)


         आजकल लोगोंमें वाचनकी (पढनेकी) वृत्ति बहुत ही घट चुकी है, इस बातको कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता है ! अब मात्र लोग धन अर्जित करने हेतु पढते हैं । एक बार चाकरी मिल गई या व्यापार चल गया तो उसके पश्चात पुस्तकको हाथ नहीं लगाते हैं और यदि पढते भी हैं तो उसका भी क्षेत्र बहुत ही सीमित होता है । गूढ अध्यात्मशास्त्र या ज्ञानवर्धक ग्रन्थ या साहित्य पढनेका चलन अब समाप्त होता जा रहा है, तभी तो कथावाचक कथा अल्प बांचते हैं और नाचने और गानेवाले कार्यक्रम कथाके नामपर अधिक करते हैं । इसके दो कारण होते हैं, एक तो कथावाचकोंकी साधना प्रगल्भ नहीं होती है, उनका भी ध्यान यश और धन पाने या आश्रम एवं भक्तोंकी संख्या बढानेमें होता है । अब, जब साधनाका चैतन्य नहीं होता तो लोग भी उन्हें कहां अधिक देर सहन कर सकते हैं; इसलिए उन्हें अनेक ‘तामझाम’ कर लोगोंको एकत्रित करना होता है । जैसे आज राजनेता पैसे देकर अपनी सभाओंमें लोगोंको बुलाते हैं, वैसे ही रज-तमका प्रलोभन देकर कथावाचक कथा बांचते हैं । वस्तुतः कथावाचकोंने लोगोंको ग्रन्थ वाचन हेतु प्रेरित करना चाहिए था । सब ग्रन्थ लेकर आएं, उसमेंसे सीखने योग्य श्लोक या तथ्यको कैसे आत्मसात करें ?, इसपर उन्हें चिन्तन कर वाचन हेतु प्रेरित करना चाहिए था; किन्तु आजकल कथाका दृश्य ही परिवर्तित हो चुका है; किन्तु हिन्दू राष्ट्रमें ऐसा नहीं होगा !
          यह सब नाटक मैंने धर्मप्रसारके मध्य देखा है; इसलिए जब उपासनाके माध्यमसे स्वतन्त्र रूपसे गुरुकार्य आरम्भ किया तो यह निश्चित किया कि लोगोंमें वाचनकी वृत्ति बढानी है । जो लोग उपासनासे या ‘व्हाट्सऐप्प’से या फेसबुकसे बहुत पहलेसे जुडे हैं, उन्हें ज्ञात ही होगा कि कैसे मैं पहले छोटे-छोटे सुवचन लिखती थी और धीरे-धीरे मैंने उसका विस्तार करना आरम्भ किया । और अब मैंने इस अक्षय तृतीयासे ‘ऑनलाइन’ दैनिक वृत्तपत्र आरम्भ किया है । इसमें भी पृष्ठोंकी संख्या अधिक न हो, लेख बहुत लम्बे न हो, इसका ध्यान रखती हूं; क्योंकि लोगोंमें पढनेकी वृत्तिका ही ह्रास हुआ है; इसलिए बच्चों जैसे सबको सिखानेका प्रयास करती हूं । कुछ लोग कहते हैं कि आप लेख या सत्संग दोहराती क्यों हैं ? उत्तर थोड़ा कटु है; किन्तु सत्य है कि सात्त्विक वृत्ति न होनेसे एक ही बार किसी तथ्यको उस या पढ लेनेसे लोग उसे अपने जीवनमें उतारते नहीं है; इसलिए उसे बार-बार बताना पडता है  ।
            उपासनाके वानप्रस्थ प्रकल्पमें एक बृहद वाचनालय होगा और सभी हेतु उनकी रुचि अनुरूप वाचन करने हेतु, अभ्यासवर्ग रखे जाएंगे, जिसमें वे ग्रन्थका वाचन कैसे करें ?, उसे वाचन करते समय जो शंकाएं आती हैं, उनका समाधान कैसे करें ?, यह सब सूत्रबद्ध पद्धतिसे सिखाया जाएगा । हिन्दू धर्ममें इतने विषयोंपर इतने ग्रन्थ हैं कि एक व्यक्ति एक जन्ममें सब एक बार भी पढ नहीं सकता है । सोचें ! इतना बृहद साहित्य होनेपर भी आजके लोग ‘फूहड कॉमेडी’ धारावाहिक देखनेमें या क्रिकेट देखनेमें अपना जीवन व्यतीत करते हैं ।
       हम चारों भाई-बहन पढनेमें अत्यधिक रुचि रखते हैं, सभीके पास अपना एक वैयक्तिक पुस्तकालय भी है; क्योंकि हमारे पिताजीने हमारे भीतर वाचन करनेकी वृत्ति बाल्यकालमें ही डाल दी थी । आजके माता-पितामें यह वृत्ति नहीं है; इसलिए बच्चोंमें भी नहीं है; अतः माता-पिताको आदर्श बनाने हेतु भी उपासनाका वानप्रस्थ प्रकल्प कार्य करेगा ।


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