वैदिक उपासना पीठके वानप्रस्थ प्रकल्पकी विशेषताएं (भाग- २)
प्रकल्पका निर्माण वास्तुशास्त्र अनुसार होनेसे व आश्रम परिसरमें होनेसे वानप्रस्थियोंको अधिक लाभ मिलेगा
वर्तमान कालमें ६० वर्षकी आयु आते-आते अनेक लोग भिन्न प्रकारके रोगोंसे ग्रस्त हो जाते हैं । ऊपरसे घरका वास्तु भी अशुद्ध रहता है; इसलिए वर्तमानकालमें वृद्धावस्थासे पूर्वकी जो अवस्था है, जिसमें व्यक्तिको स्वस्थ होना चाहिए, उसमें वे अस्वस्थ हो जाते हैं, ऐसेमें जो समय कुछ अच्छे कार्यको देना चाहिए, वह रोग निवारणमें निकल जाता है ।
आश्रमकी ‘भूमि’का चयन करते समय इस बातका विशेष ध्यान रखा है कि वह निसर्गके निकट हो, नगरी वातावरणसे दूर हो एवं वास्तु सात्त्विक हो !
अभीतक जितने भी सन्तोंने इस वास्तुको देखा है या यहां उनके चरण पडे हैं, सभीने इस आश्रमकी वास्तुकी अत्यधिक प्रशंसा की है इसके विषयमें हम आपको पूर्वके लेखमें भी बता ही चुके हैं । यहांकी वास्तुमें चैतन्यका ही प्रभाव है कि जो भी सन्त आते हैं, उन्हें यहां रहना अच्छा लगता है । कुछ सन्तोंने इसे पुण्यभूमि तो किसीने चैतन्यमय भूमि कहा है । अब ऐसे वास्तुमें यदि कोई वानप्रस्थी आकर रहेंगे तो उन्हें निश्चित ही शारीरिक एवं मानसिक स्तरपर लाभ मिलेगा ।
आश्रम परिसरमें भवन निर्माण करते समय भी हम इस बातका विशेष ध्यान रख रहे हैं कि वह अधिकसे अधिक वास्तुशास्त्र अनुसार बना हो । आश्रमकी भूमि पूर्वाभिमुख है एवं उसका द्वार भी हमने वास्तुशास्त्र अनुसार चुतर्थ व पञ्चम पदमें बनानेका प्रयास किया है । आश्रम परिसरमें मात्र सात्त्विक वृक्ष एवं पौधोंको लगाया जा रहा है तथा वह भी वास्तुशास्त्र अनुसार लगानेका प्रयास किया जा रहा है । इस आश्रममें कुछ बातें ऐसी हैं जो पहलेसे ही वास्तुशास्त्रके अनुसार थीं, जैसे ईशान कोणपर कुंआ ! सबसे अच्छी बात यह है कि यहां सात्त्विक पक्षी भी सहज ही आकर विचरण करते हैं, जैसे नीलकण्ठ, भारद्वाज और खलिहानी पक्षीने तो मिट्टीके घोंसले बनाकर अपनी गृहस्थी पहले ही बसा ली है । यह एक सतयुगकालीन तीर्थक्षेत्र है; क्योंकि यहां परशुराम जन्मस्थल भी है, जो अभीतक अगम्य होनेके कारण मानवीय विकाससे दूर था; इसलिए उस स्थानका चैतन्य आज भी विद्यमान है और उसका लाभ इस स्थानको मिलता है ।
चारों और विन्ध्याचलकी पर्वत शृंखला एवं घने वन इस स्थानके सौन्दर्यको और भी सुरम्य बना देते हैं । २० किलोमीटरकी परिधिमें कोई भी उद्योग न होनेसे एवं चारों ओर ग्रामीण परिवेश होनेसे यहां प्रदूषण न के समान है तो वानप्रस्थियोंके स्वास्थ्यके लिए बहुत ही अच्छा है ।
आश्रम परिसर होनेके कारण वानप्रस्थियोंको चैतन्यका लाभ मिलेगा एवं सन्त सान्निध्य भी मिलेगा, जिससे उन्हें योग्य मार्गदर्शन प्राप्त होगा और उनका मनुष्य जीवन सार्थक होगा । आश्रम परिसरमें गोशाला भी है; अतः उसके चैतन्यका भी लाभ सभीको मिलेगा ।
इस प्रकल्प अन्तर्गत साधक वृत्तिके व्यक्ति अपना पंजीकरण कराकर इसका लाभ उठा सकते हैं, इस सम्बन्धमें अधिक जानकारी हेतु हमें नीचे दिए गए सम्पर्कपर अपना सन्देश भेज सकते हैं ।
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