बहुमुखी प्रतिभाके धनी एवं स्वतन्त्रता संग्रामके अग्रणी स्वातन्त्र्य वीर सावरकर


veer-sawarkarअ. वीर सावरकर, एक ओजस्वी हिन्दुत्वनिष्ठ नेता
‘विनायक दामोदर सावरकर’, अंग्रेजी सत्ताके विरुद्ध, भारतकी स्वतन्त्रताके लिए संघर्ष करनेवाले, उस महान हिन्दुत्वनिष्ठ सेनानीका, यह पूरा नाम था जिन्हें हम वीर सावरकरके नामसे जानते हैं । सावरकर, २० वीं शताब्दीके सबसे प्रखर हिन्दुत्ववादी नेता थे । उन्हें ‘हिन्दू’ शब्दसे अत्यन्त लगाव था । वह सदैव कहते थे कि उन्हें स्वातन्त्रय वीरकी अपेक्षा ‘हिन्दू संगठक’ कहा जाए । वस्तुतः हिन्दू राष्ट्रकी राजनीतिक विचारधाराको विकसित करनेका बहुत बडा श्रेय सावरकरको जाता है । उन्होंने जीवन भर हिन्दू, हिन्दी और हिन्दुस्थानके लिए कार्य किया । वे अखिल भारत हिन्दू महासभाके ६ बार राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए ।आ. क्रान्तिकारी संगठनकी स्थापना
वीर सावरकरने पूनामें ‘अभिनव भारती’ नामक एक ऐसे क्रान्तिकारी संगठनकी स्थापना की, जिसका उद्देश्य आवश्यकता पडनेपर बलप्रयोगद्वारा स्वतन्त्रता प्राप्त करना था । स्वाधीनताके लिए कार्य करने हेतु उन्होंने एक गुप्त संस्था बनाई थी, जो ‘मित्र मेला’के नामसे जानी गई । इसके अतिरिक्त भी उनके चरित्र और कृतित्वकी कई विशेषताएं थीं जो उन्हें भारतीय इतिहासमें हिन्दुत्वनिष्ठोंमें अग्रिम पंक्तिमें स्थान दिलाती हैं ।
इ. श्री सावरकरकी विलक्षण स्मरणशक्ति
श्री सावरकर प्रथम ऐसे कवि थे, जिन्होंने लेखनी और कागद (कागज़) के बिना कारागारकी भित्तियोंपर पत्थरके खण्डोंसे (टुकडोंसे) कविताएं लिखीं । उन्होंने अपनी रची दस सहस्रसे (हज़ारसे) भी अधिक पंक्तियोंको प्राचीन वैदिक साधनाके अनुरूप वर्षों स्मृतिमें सुरक्षित रखा, जबतक वह किसी न किसी भांति देशवासियोंतक नहीं पहुंच गई । श्री सावरकर जीवन भर अखण्ड भारतके पक्षमें रहे और ख्रिस्ताब्द १९४७ में इन्होंने भारत विभाजनका विरोध किया ।
ई. वीर सावरकरकी विशेष उपलब्धियां
वीर सावरकरके नाम इतिहासकी अनेकानेक उपलब्धियां लिखी हुई हैं । श्री सावरकर ही भारतके प्रथम ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यके केन्द्र लन्दनमें उसके विरुद्ध क्रान्तिकारी आन्दोलन संगठित किया था । इसके अतिरिक्त ख्रिस्ताब्द १९०५ के बंग-भंगके उपरान्त ख्रिस्ताब्द १९०६ में ‘स्वदेशी’का नारा दे, विदेशी वस्त्रोंकी होली जलानेवाले, अपने विचारोंके कारण ‘बैरिस्टर’की उपाधि खोनेवाले, पूर्ण स्वतन्त्रताकी मांग करनेवाले, १८५७ के संग्रामको भारतका ‘स्वाधीनता संग्राम’ निरुपित करते हुए, इसपर एक सहस्र (हज़ार) पृष्ठोंका इतिहास लिखनेवाले, पहला भारतीय ध्वज बनानेवाले, प्रथम व्यक्ति वीर सावरकर ही थे । वे प्रथम क्रान्तिकारी थे, जिनपर स्वतन्त्र भारतके शासनने मिथ्या दोषारोपण कर न्यायालयमें वाद (मुक़दमा) प्रविष्ट किया और निर्दोष प्रमाणित होनेपर कांग्रेसके नेतृत्ववाली ‘शासन व्यवस्था’ने उनसे क्षमा मांगी । वे विश्वके एकमात्र लेखक थे जिनके ग्रन्थको प्रकाशित होनेके पूर्व ही ब्रिटिश और ब्रिटिशसाम्राज्यके शासनने प्रतिबन्धित कर दिया था । सावरकर ही संसारके प्रथम राजनीतिक बन्दी थे, जिनका प्रकरण ‘हेग’के अन्तरराष्ट्रीय न्यायालयमें चला था ।
उ. ग्रन्थोंकी रचना
वीर सावरकरजीने अनेक ग्रन्थोंकी रचना की, जिनमें ‘भारतीय स्वातन्त्रय युद्ध’, मेरा आजीवन कारावास’ और ‘अण्डमानकी प्रतिध्वनियां’ (सभी अंग्रेजीमें) अधिक प्रसिद्ध हैं । उन्होंने कारागृहमें ‘हिन्दुत्व’पर शोध ग्रन्थ भी लिखा ।
संक्षेपमें वे न केवल स्वाधीनता-संग्रामके एक तेजस्वी सेनानी थे; अपितु एक सिद्धहस्त लेखक, विचारक, भाषाविद, कवि, अप्रतिम क्रान्तिकारी, दृढ एवं दूरदर्शी राजनेता, समर्पित समाज सुधारक, द्रष्टा, महान कवि, महान इतिहासकार और ओजस्वी वक्ता भी थे ।



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