विदेश धर्मयात्राके मध्य सीखने हेतु मिले कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य


इस लेखको लिखनेके पीछे किसी भी संस्कृति या सभ्यताकी आलोचना करना मेरा हेतु नहीं है, अपितु वैदिक सनातन धर्मका प्रसार सर्वत्र क्यों होना चाहिए ?, यह मूल उद्देश्य है । धर्माभिमान एवं योग्य दृष्टिकोणके अभावमें अनेक भारतीय विदेशी संस्कृति और सभ्यताकी स्तुति करते नहीं थकते हैं; इसलिए अपने अनुभव इस लेखके माध्यमसे साझा कर रही हूं ।
विदेशोंमें ऊपरी तामझाम और दिखावा अधिक प्रमाणमें है । आतिथ्य सत्कार, अपने कुटुम्बियोंसे प्रेम, पवित्रता, यह सब कहीं दिखाई नहीं देता । सब अपने अपने सुखमें मग्न रहते हैं । आध्यात्मिक सुख अर्थात आनंदकी परिभाषा तो विदेशियोंको पता ही नहीं है, उनके लिए देह और मनका सुख ही अंतिम सुख है, इसे मैंने स्पष्ट रूपसे तब देखा जब मैं जून २०१३ में इटलीमें थी और एक दिवस मुझे बताया गया कि आज मूनलाइट (moonlight) है अर्थात सभी व्यक्ति अपने घरके सामनेकी श्वेत प्रकाशको जलाकर रखेंगे और अपने अपने घरोंसे निकलकर उस प्रकाशको देखेंगे और होटलों या बारमें जाकर मद्य पीएंगे, मांसाहार करेंगे और नृत्य करेंगे अर्थात तमोगुणी कृत्य करनेमें उन्हें सुख मिलता है । उनके घर व्यवस्थित और सुंदर होते हैं; परन्तु अध्यात्मसे कोसों मील दूर होनेके कारण उनके घरका वास्तु तमोगुणी होता है ।
  किसी साधकके आग्रहपर जब हम कुछ विदेशियोंके घर कुछ कार्य हेतु गए तो उन्होंने जल तकके लिए नहीं पूछा, कार्य समाप्त कर, खडे-खडे विदा कर दिया । आतिथ्य सत्कार, यह उनकी संस्कृतियोंमें है ही नहीं । कुटुम्ब व्यवस्था भी दिखाई नहीं दी, जैसे पशु जबतक बच्चे उडने लायक न हो जाएं तबतक उसकी देखभाल करते हैं, उसीप्रकार वहां पति-पत्नी, जिनमें अनेक अविवाहित ही पति-पत्नी समान रहते हैं, वे बच्चेके सोलह वर्ष होते-होते उनका साथ छोड देते हैं । वे लोग प्रेमके लिए जीवनपर्यन्त लालायित रहते हैं । वहां सभीके मुखपर एक उदासी और सूनापन स्पष्ट रूपसे दिखता है; परंतु दिखावटी मुस्कान और ‘चाओ’ (इटलीमें नमस्कारको चाओ कहते हैं ) कहनेमें पीछे नहीं हटते ।



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