विदेशमें रहनेवाले हिन्दुओंकी दु:स्थिति, कारण एवं निवारण (भाग – ५)


यूरोपमें रहनेवाले हिन्दुओंने अनेक बार मुझसे कहा कि यहां वृद्धों और दिव्यांगोंका, शासन बहुत अच्छेसे देखभाल करता है, उन्हें बहुत सुविधाएं देता हैं, इस बातकी वे स्तुति करते नहीं थकते थे । मैंने सोचा इन सबको योग्य दृष्टिकोण मिलना ही चाहिए; इसलिए एक सत्संगमें इस विषयमें कुछ तथ्य बताए जो इस प्रकार थे : जिस देशमें पुत्र एवं पुत्री अपना नैतिक धर्म भूलकर अपनी वृद्ध परिजनोंकी देखभाल नहीं करते हैं, उस देशके शासनको तो उनकी देखभाल करनी ही पडेगी, वे उन्हें मरनेके लिए तो नहीं छोड सकते हैं और जब वे सक्षम होते हैं, उनसे वह देश ३०% ‘कर’ लेता है, यह न भूलें ! क्या यदि सभी पुत्र या पुत्री अपने माता-पिताकी सेवा, कृतज्ञताके भावसे करते तो क्या ऐसे देशमें वृद्धोंहेतु ऐसी ही सुविधाएं शासन देता ? जिस संस्कृतिमें माता-पिता अपने नवजात शिशुको भिन्न कक्षमें अकेला छोडकर, स्वयं सोने चले जाते हैं, जिस संस्कृतिमें माता-पिताके लिए १६ वर्ष पूर्ण होते ही उनके बच्चे बोझ लगने लगते हैं, उन्हें वे अपनी सहचर ढूंढने एवं पृथक रहने हेतु कहने लगते हैं, उस संस्कृतिमें माता-पिता और सन्तानोंके मध्य आत्मीयता कहां होती है ? वे तो पशु समान अपनी लैंगिक इच्छाकी पूर्ति हेतु एकसाथ रहते हैं, कभी विवाह करते हैं तो कभी नहीं करते हैं, इसी क्रममें यदि चाहे-अनचाहे बच्चे जन्म ले लें तो उनका लालन-पालन करना उनकी विवशता होती है । आपको बता दें कि विदेशमें माता-पिता अपने बच्चोंको डांट या मार नहीं सकते हैं; यदि किसी बच्चेने शासनसे परिवाद कर दिया तो उन्हें त्वरित दण्डित किया जाता है; क्योंकि वहां प्रेम होता ही नहीं; इसलिए कई बार अपने स्वार्थमें व्यवधान पडनेपर माता-पिता अपने बच्चोंके साथ हिंसक हो जाते हैं, सौतेले पिताद्वारा अपनी सन्तानोंका लैंगिक अत्याचार तो ९०% घरोंमें होता है । अभी चार दिवस पूर्व भी समाचार प्रकाशित हुआ था कि स्त्रीने अपने पतिको जीवित जलानेका प्रयास किया; क्योंकि उसने अपनी सौतेली पुत्रीका बलात्कार करते हुए पतिको रंगे हाथों पकडा था | कोई विधान क्यों बनता है ?, जब उस क्षेत्रमें ऐसी बातें होने लग जाएं, जिसे मानवीय आधारपर नियन्त्रित नहीं किया जा सके तो दण्डका कठोर विधान लागू कर दिया जाता है !
ऑस्ट्रियामें एक हिन्दूने मुझे कहा कि बुढापा यहां नहीं काटना है, जब मैंने पूछा क्यों ? तो वे बोले, “यहां आए दिन समाचार छपते रहते हैं कि घरका वृद्ध कई दिवस पूर्व मर चुका था और जब पडोसीको उसके सडे शवकी दुर्गन्ध आने लगी तो उसने पुलिसको सूचना दी या उसके घरसे कीडे निकलते दिखे तो पुलिस या अन्य लोगोंको सूचना दी । विदेशमें लोग अपने सहचरके (अनेक बार वे पति-पत्नी नहीं होते हैं) साथ एकाकी रहना पसन्द करते हैं और यदि वे वृद्ध हो जाते हैं और उनमेंसे एककी मृत्यु हो जाए तो उनके पास दो ही पर्याय होते हैं, या तो वे अकेले रहें या शासकीय वृद्धाश्रममें चले जाएं । अब जिस समाजकी स्थिति इतनी विकट हो, वहांके शासनको ‘कुछ न कुछ’ तो करना पडेगा, यह पाश्चात्योंकी स्तुति करनेवालोंको समझमें नहीं आती है । और क्या वृद्धाश्रमके शासकीय कर्मचारी, एक संस्कारी पुत्र या पुत्रवधू समान वह प्रेम और सम्मान दे पाएंगे, किञ्चित सोचें ! किसी भी वृद्धाश्रमके वृद्धोंकी नेत्रोंमें झांककर देखें, वे प्रेम न मिलनेसे कितने आहत होते हैं, उनके नेत्रोंमें कितनी निराशा होती है, कोई उनकी बात प्रेमसे सुने, उनके साथ समय बिताए इसकी उनमें कितनी तडप होती है !
रही बात दिव्यांगोंकी तो शास्त्र कहता है ‘अधर्म एवं मूलं सर्व रोगानां’, जिस समाजमें (या कुलमें) अधर्मका जितना अधिक प्रमाण होगा, वहां शारीरिक और मानसिक रूपसे दिव्यांगोंकी संख्या उतनी ही अधिक होगी । भारतमें भी धर्मग्लानिके कारण ही ऐसा लोगोंकी संख्यामें वृद्धि हुई है । अब शासनको मूल कारण तो ज्ञात नहीं, कुटुम्ब भावना न होनेसे ऐसे लोग अपने ही परिवारके सदस्यको भार लगते हैं तो वे उन्हें शासनद्वारा संचालित पुनर्वास केन्द्रमें छोडकर अपने उत्तरदायित्वसे पल्ला झाड लेते हैं । अब आप बताएं शासनके पास उनके देखभालके अतिरिक्त कोई और पर्याय है क्या ? और वहां तो घर-घरमें ऐसा है तो शासन-प्रशासनसे सम्बन्धित, सभीके घरोंमें ऐसे सदस्य होते हैं तो ‘कमसे कम’ उनकी देखभाल हेतु सुविधा करना, यह तो उनका नैतिक कर्तव्य है, इसमें बडप्पन कैसा ? अतः हिन्दुओं ‘all that glitters is not gold’, ‘जो दिखाई देता है वह सच नहीं होता’ !
वहांकी संस्कृतिके अनेक उदाहरण हैं मेरे पास, बेल्जियममें रहनेवाली एक हिन्दू महिलाने एक यूरोपीय मूलके व्यक्तिसे विवाह किया था, वे बात ही बातमें बता रही थीं कि एक समय उनका वाहन चोरी हो गया था तो उनके ससुर आकर अपनी पुरानी साइकिल दे गए और जब हम उन्हें कुछ समय पश्चात लौटाने गए तो उन्होंने नूतन साइकिल समान प्रतिदिनका किराया लगाकर, हमसे उतने रुपये मांगे और मेरे पतिने उन्हें सहर्ष धन्यवाद ज्ञापन करते हुए दिए, मैं यह सब देख आश्चर्यचकित हो गई ! यह है वहांकी संस्कृति, वैसे चिन्ता न करें, यह सब हमारे देशमें भी होने लगा है, अन्ततः हम भी तो आधुनिक बन रहें हैं ! – तनुजा ठाकुर (क्रमशः)



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