विद्यार्थियोंके गुण संवर्धनमें असफल रही है आधुनिक मैकाले शिक्षण पद्धति !


अनालस्यं ब्रह्मचर्यं शीलं गुरुजनादरः । 

स्वावलम्बः दृढाभ्यासः षडेते छात्र सद्गुणाः ॥

अर्थ : अनालस्य, ब्रह्मचर्य, शील, गुरुजनके लिए आदर, स्वावलम्बन और दृढ अभ्यास, ये छह छात्रके सद्गुण हैं । वर्तमान कालकी शिक्षण पद्धतिमें ऐसे गुणोंको आत्मसात करने हेतु नहीं सिखाया जाता है; इसलिए आजकी युवा पीढी आलसी होती है । आप उन्हें पांच किलो तरकारी एक किलोमीटर चलकर बिना वाहन लाने बोल दें, उनकी प्रतिक्रयासे आपको मेरे इस तथ्यकी प्रतीति हो जाएगी । ब्रह्मचर्यका तो जैसे विद्यार्थीवर्गमें महत्त्व ही नहीं रह गया, पहले ग्रामीण अंचलमें एवं युवतियोंमें चरित्रनिष्ठा दिखाई दिया करती थी; किन्तु स्मार्ट फोन और फ्री ‘wifi’ ने इसका भी सत्यानाश कर दिया है । अब तो विवाह पूर्व शारीरिक सम्बन्ध बनाना सामान्य बात हो गई है ।
यदि स्वावलम्बनका भी संस्कार युवा पीढीको अंकित किया गया होता तो इस देशमें इतनी बडी संख्यामें युवा वृत्तिहीन (बेरोजगार) दिखाई नहीं देते । इस देशमें वृत्तिहीनता भी इसी आसुरी मैकाले शिक्षण पद्धतिकी उपज है ।
और अभ्यास, चिन्तन, स्वाध्याय यह सब तो जैसे पुरातन बातें हो गई हैं । विद्यालयमें शिक्षक रट्टू तोता बनने हेतु प्रेरित करते हैं और जो बच जाता है वह आजके ‘कोचिंग सेंटर’ कर देते हैं । इसलिए हिन्दू राष्ट्र चाहिए; क्योंकि तभी सर्वत्र प्राचीन गुरुकुल पद्धति अनुसार शिक्षण व्यवस्था लागू की जा सकती है ।



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution