यदि मन्दिरमें आनेवाले अतिमहत्त्वपूर्ण व्यक्तियोंके आनेके कारण भक्तोंको कष्ट होता है, तो भगवान उन्हें क्षमा नहीं करेंगे ! – मद्रास उच्च न्यायालय


२५ मार्च, २०२२
      “यदि मन्दिरोंमें दर्शन करनेवाले अतिमहत्त्वपूर्ण व्यक्ति, भक्तोंके व्यवधानका कारण हैं, तो ऐसे लोग पाप कर रहे हैं । भगवान उन्हें क्षमा नहीं करेंगे ।” मद्रास उच्च न्यायालयके न्यायाधीश एस.एम. सुब्रमण्यमने एक याचिकापर सुनवाई करते हुए ऐसा कहा, जब तमिलनाडुके तूतीकोरिन जनपदके तिरुचेंदूर स्थित प्रसिद्ध अरुलमिगु सुब्रमनिया स्वामी मन्दिरसे सम्बन्धित एक याचिकापर सुनवाई हुई ।
मद्रास उच्च न्यायालयद्वारा दी गई सूचनाएं !
१. ‘वी.आई.पी.’ संस्कृतिके कारण, सामान्य लोगोंको विशेषत: मन्दिरोंमें कष्टोंका सामना करना पडता है । ‘वी.आई.पी.’ प्रवेश केवल सम्बन्धित व्यक्तियों या उनके परिवारके लिए उपलब्ध होना चाहिए, अन्य सम्बन्धियोंको नहीं ।
२. विभिन्न शासकीय विभागोंमें, सबसे प्रतिष्ठित व्यक्तियोंकी श्रेणीमें आनेवाले अधिकारियों, उनके साथ आनेवाले लोगोंके साथ-साथ, अन्य विशेष भक्तों तथा अर्पणदाताओंको पृथक कतारोंमें दर्शनकी सुविधा नहीं दी जानी चाहिए ।
३. कुछ लोगोंको विशेष दर्शन सुविधाएं दी जानी चाहिए, इसमें कोई संशय नहीं; किन्तु विशेष पदपर कार्यरत लोगोंको ही यह सुविधा मिलनी चाहिए । अधिकांश विकसित देशोंमें, केवल उच्च पदस्थ व्यक्तियोंको ही इस प्रकारकी सुविधाएं प्रदानकी जाती हैं । इन लोगोंको संविधानद्वारा सम्मानित घोषित किया होता है । ऐसी सुविधा, लोगोंके सामान्य अधिकारोंमें बाधक नहीं होनी चाहिए ।
४. मन्दिरों जैसे स्थानोंपर ‘महनीय व्यक्ति दर्शन’की सुविधासे भक्त त्रस्त हैं और वे व्यवस्थाकी आलोचना करते हैं । मन्दिर प्रशासनको ‘महनीय व्यक्ति दर्शन’की व्यवस्था इस प्रकारसे करनी चाहिए, कि इससे सामान्य भक्तोंको कोई असुविधा न हो ।
५. तमिलनाडु शासनने ‘महनीय व्यक्तियों’की सूची बनाई है । ‘महनीय व्यक्तियों’के साथ, रक्षक और कर्मचारी भी होते हैं । ऐसे समयमें, महनीय व्यक्तियोंके साथ आनेवालोंको विशेष दर्शनकी सुविधा नहीं दी जानी चाहिए । कर्मचारियोंको एक सामान्य पङ्क्तिमें या शुल्कका भुगतान करके दर्शन करनेके लिए कहा जाना चाहिए ।
६. भक्त अपनी धार्मिक आस्थाओंके कारण भगवानसे प्रार्थना करते हैं । ऐसे समयमें उनके मध्य कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए । यदि महनीय व्यक्ति दर्शनके लिए आते हैं, तो उन्हें सामान्य भक्तके रूपमें आना चाहिए ।
       यह तथ्य न्यायालयको क्यों बताना पड रहा है ? इसे अतिमहत्त्वपूर्ण व्यक्ति एवं मन्दिर प्रशासन स्वयं क्यों नहीं समझते ? यदि एक महत्त्वपूर्ण व्यक्तिके कारण एक व्यक्तिको १० मिनट भी प्रतीक्षा करनी पडे, तो १०० व्यक्तियोंको १००० मिनट प्रतीक्षा करनी पडती है, ऊपरसे ईश्वरके प्रति ध्यान विचलित होकर भक्त महत्त्वपूर्ण व्यक्तिके प्रति रुष्ट हो जाते है, इससे उस महत्त्वपूर्ण व्यक्तिकी अपरिमित आध्यात्मिक हानि होती है; अतः उक्त अनुचित कृतिसे अन्तर्मुख होकर सभीने अन्योंका विचारकर सुधार करना चाहिए । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


सूचना: समाचार / आलेखमें उद्धृत स्रोत यूआरऍल केवल समाचार / लेख प्रकाशित होनेकी तारीखपर वैध हो सकता है। उनमेंसे ज्यादातर एक दिनसे कुछ महीने पश्चात अमान्य हो सकते हैं जब कोई URL काम करनेमें विफल रहता है, तो आप स्रोत वेबसाइटके शीर्ष स्तरपर जा सकते हैं और समाचार / लेखकी खोज कर सकते हैं।

अस्वीकरण: प्रकाशित समाचार / लेख विभिन्न स्रोतोंसे एकत्र किए जाते हैं और समाचार / आलेखकी जिम्मेदारी स्रोतपर ही निर्भर होते हैं। वैदिक उपासना पीठ या इसकी वेबसाइट किसी भी तरहसे जुड़ी नहीं है और न ही यहां प्रस्तुत समाचार / लेख सामग्रीके लिए जिम्मेदार है। इस लेखमें व्यक्त राय लेखक लेखकोंकी राय है लेखकद्वारा दी गई सूचना, तथ्यों या राय, वैदिक उपासना पीठके विचारोंको प्रतिबिंबित नहीं करती है, इसके लिए वैदिक उपासना पीठ जिम्मेदार या उत्तरदायी नहीं है। लेखक इस लेखमें किसी भी जानकारीकी सटीकता, पूर्णता, उपयुक्तता और वैधताके लिए उत्तरदायी है।

विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution