मां-बाप-भाई एक-एककर मर गए, अन्तिम संस्कारमें सम्मिलित नहीं होने दिया, २० वर्षीय विष्णुको किस अपराधका मिला दण्ड ?
०७ मार्च, २०२१
इलाहाबाद उच्च न्यायालयद्वारा मुक्त किए जानेके पश्चात विष्णु तिवारी लगभग २० वर्ष पश्चात कारागारसे निकले हैं । राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोगने इस प्रकरणमें संज्ञान लेते हुए विस्तृत ब्यौरा मांगा है । संस्थाने उत्तर प्रदेशके ‘डीजीपी’ और मुख्य सचिवको उत्तर देनेको कहा है । विष्णुको दुष्कर्मके प्रकरणमें फंसाया गया था । ‘एनएचआरसी’ने पूछा है कि इसके लिए उत्तरदायी अधिकारियोंके विरुद्ध क्या कार्यवाही की गई है ?
साथ ही पीडित विष्णु तिवारीको राहत और उनके पुनर्वासके लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं ? इसके लिए ६ सप्ताहका समय दिया गया है । ‘सेंटेंस रिव्यू बोर्ड’पर (दण्ड समीक्षा मण्डल) प्रश्न उठाते हुए संस्थाने कहा है कि यह ‘बोर्ड’ निष्क्रिय हो गया है । कारागारमें विष्णुका आचरण अच्छा पाया गया था; परन्तु आश्चर्यकी बात यह है कि इन सबके पश्चात भी उन्हें पिताके अन्तिम संस्कारमें सम्मिलित होनेके लिए ‘पैरोल’ नहीं दिया गया । भाईके अन्तिम संस्कारमें सम्मिलित होनेकी भी अनुमति नहीं मिली । उनपर वर्ष १९९९ में ‘अनुसूचित जाति’की एक महिलाके साथ बलात्कारका आरोप लगा था । २००५ में वो न्यायके लिए उच्च न्यायालय पहुंचे और वहांसे उन्हें अब प्रतिभूति मिली है ।
उपरोक्त प्रकरणमें आरोपी बहुसङ्ख्यक समुदायसे था और निर्दोष होते हुए भी अपने जीवनके दो दशक एवं अपने परिवारके सदस्योंकी बलि भ्रष्ट प्रशासनके कारण दे दी । यदि यही आरोपी कोई जिहादी या अनुसूचित जाति आदिका होता तो राजनीतिमें भूचाल आ गया होता । ‘एससी-एसटी’ अधिनियमके नामपर राजनेता कितने निर्दोष बहुसङ्ख्यकोंकी बलि देंगे ? एक ओर नेतागण बलात्कारियोंको आर्थिक सहायता देकर बसाते हैं, तो दूसरी ओर एक निर्दोषकी ओर कोई देखता भी नहीं ! आगामी हिन्दू राष्ट्रमें इस प्रकारकी विसंगतियां अथवा अन्याय किसी भी निर्दोषके साथ नही होगा; अतः सभी राष्ट्रवादी हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाके लिए अपने प्रयासोंको और अधिक रूपसे कार्यान्वित करते रहें ! – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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