विवाहपर समाजमें जागृति आवश्यक


विवाह एक यज्ञ कर्म है; अतः उसके अंतर्गतकी जानेवाली धार्मिक विधियोंको श्रद्धापूर्वक करने पर अधिक महत्त्व देना चाहिए, इससे पति-पत्नीमें मानसिक और आध्यात्मिक एकरूपता साध्य होनेमें सहायता मिलती है जिससे उच्च कोटिके जीवात्माओंका उनके माध्यमसे जन्म होता है एवं उनका वैवाहिक जीवन आध्यात्मिक प्रगति हेतु पूरक होता है । इसके विपरीत, आजके विवाहने एक बाह्य प्रदर्शन और अनावश्यक अपव्ययका स्वरूप ले लिया है । आजकल विवाहमें किसने कितना मूल्यवान वस्त्र पहना है ?, कितने प्रकारके व्यंजन बने हैं इत्यादिपर अधिक महत्त्व दिया जाता है; फलस्वरूप विवाहके मूलभूत उद्देश्य साध्य नहीं होते; अतः अनेक कोटि रूपये व्ययकर किया गया विवाह दो-चार वर्षोंमें टूट जाता है । इससे ही समाजको इस विषयपर भी जागृति निर्माण करना अति आवश्यक हो गया है ।



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