क्या आपको ज्ञात है कि आज अधिकांश वृद्धाश्रमोंमें नगरों एवं महानगरोंके ही वृद्ध क्यों रहते हैं ? नगरों एवं महानगरोंमें रहनेवाले दम्पति सम्पूर्ण दिवस धन अर्जित करनेमें व्यस्त रहते हैं एवं घरपर आनेके पश्चात् या तो समाजमें उनकी प्रतिष्ठा कैसे बढे, इस हेतु वे समाजमें सम्पर्क बढाने हेतु पार्टियोंमें जाते हैं या दूरदर्शन संचमें कार्यक्रम देखनेमें या वर्तमान कालमें फेसबुक, ट्विटर इत्यादि सामाजिक जालस्थलोंपर या ‘व्हाट्सएप’पर अपनी इच्छाओंकी पूर्ति हेतु समय व्यतीत करते हैं । यथार्थमें अपने बच्चोंके लिए उनके पास समय ही नहीं होता, वे उन्हें प्रतिष्ठित विद्यालय या महाविद्यालयमें भेजकर, उन्हें मूल्यवान वस्त्र एवं सब सुख-सुविधाएं देकर अपने पालक होनेका धर्म निभा लिया ऐसा समझते हैं, ऐसेमें उनके बच्चे बडे होकर सुख-सुविधाओंसे युक्त वृद्धाश्रममें यदि भेज देते हैं तो इसमें आश्चर्य कैसा ?
जब पालकोंके पास अपने बच्चोंके लिए समय नहीं होता तो यदि भविष्यमें उनके बच्चोंके पास भी उनके लिए समय न हो तो इसमें अनुचित क्या है ? बच्चे तो अनुकरणप्रिय हैं वे वही सीखते हैं जो आप उन्हें सिखाते हैं ! स्वार्थी और भोगी पालकोंके बच्चे उनके जैसे ही होंगे न ! – तनुजा ठाकुर
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