
शारीरिक स्तरकी व्यवस्थितता अर्थात प्रत्येक कृतिको व्यवस्थित करनेसे मानसिक स्तरके व्यवस्थितताके चरणपर हमारा मार्गक्रमण होता है, इससे कुछ काल उपरान्त वैचारिक सुस्पष्टताके चरणको साध्य करना सरल हो जाता है ।
जो व्यक्ति अव्यवस्थित रहते हैं, उनकी मानसिक प्रक्रियामें भी अस्थिरता, नियोजनबद्धताका अभाव, अनुशासनहीनता, समयबद्धताका अभाव, नियम पालनका अभाव, दूसरोंका विचार न करनेकी वृत्तिका होना, जैसे दुर्गुण, स्पष्ट दिखाई देते हैं । जैसे कार्यालयसे आनेके पश्चात वाहनकी कुंजीको (चाभीको) सदैव विशिष्ट स्थानपर ही रखना, इससे उसे ढूंढनेमें स्वयंका एवं दूसरोंका समय बचता है, नियम पालन करनेकी वृत्ति निर्माण होती है, अनुशासनबद्ध रहनेमें भी सहायता मिलती है । इस प्रकार यदि प्रत्येक कृति व्यवस्थित करनेका हम प्रयास करें तो अपने दिनचर्याके माध्यमसे ही हमारे भीतर अनेक गुणोंका संवर्धन होने लगता है अर्थात मात्र शारीरिक स्तरपर व्यवस्थित रहनेसे ऊपर बताए गए दुर्गुणोंके स्थानपर गुण संवर्धन होता है । इससे मानसिक प्रक्रियामें भी सुस्पष्टता आती है, जिसके फलस्वरूप बुद्धि भी योग्य निर्णय लेनेमें सक्षम होने लगती है अर्थात बौद्धिक व्यवस्थितताका चरण साध्य होने लगता है और अन्तत: आध्यात्मिक व्यवस्थितता, अर्थात इन्द्रियोंको नियन्त्रित करना, अपने मनके संस्कारोंको नष्ट करना, इस ओर जीवात्माका मार्गक्रमण होने लगता है; अतः प्रत्येक कृतिको व्यवस्थित करना, यह व्यक्तित्व विकास एवं आध्यात्मिक प्रगति हेतु पोषक सिद्ध होता है ! – तनुजा ठाकुर
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